मोक्षप्राप्ति का भ्रमजाल

आशा अपनी दोनों बेटियों गुड्डो और लाडो के साथ खेल में व्यस्त थी. उन की बालसुलभ क्रीड़ाओं को देखदेख कर निहाल हो रही थी. तभी पड़ोस वाली शर्मा आंटी आ गईं. मुसकान तिरछी करते हुए बोलीं, ‘‘खूब मस्ती हो रही है मांबेटियों के बीच.’’

‘‘आइए आंटीजी, कहते हुए आशा बेटियों को खेलता छोड़ उन के लिए कुरसी ले आई.’’

‘‘अब फटाफट एक बेटा और कर ले, ताकि परिवार पूरा हो जाए,’’ आंटी ने अपनापन जताते हुए कहा.

‘‘हम दो, हमारे दो, हमें ये 2 बेटियां ही काफी हैं. हमारा परिवार पूरा हो गया, आंटी. हमें तीसरे बच्चे की चाह नहीं है. आप बताइए क्या लेंगी, चाय या कौफी?’’ आशा ने बात का रुख बदलते हुए कहा.

‘‘अरे, कैसी नासमझी वाली बातें करती हो? धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि बेटे के हाथों पिंडदान न हो तो मोक्ष नहीं मिलता. जब तक चिता को बेटा मुखाग्नि नहीं देता, आत्मा को मुक्ति नहीं मिलती.’’

‘‘आंटी, क्या आप ने चिता के बाद की दुनिया देखी है? क्या आप दावे से कह सकती हो कि मरने के बाद क्या होता है?’’ आशा ने प्रश्न किया.

‘‘नहीं तो.’’

‘‘फिर आप कैसे कह सकती हैं कि बेटा मुखाग्नि नहीं देगा तो आत्मा को मुक्ति नहीं मिलेगी? बहुत से लोग ऐसे भी होते हैं जिन के कोई संतान ही नहीं होती. या फिर संतान इतनी दूर होती है कि समय पर पहुंच ही नहीं पाती. उन की आत्माएं क्या भटकती रहती हैं?’’ आशा के तर्कों ने आंटी को निरुत्तर कर दिया.

उसे अपने बचपन की एक घटना मालूम थी. उस के चाचा के अपना कोई बेटा नहीं था. जब उन की मृत्यु हुई तो मुखाग्नि देने के लिए पंडितजी ने बेटे की अनिवार्यता बताई. बेटी ने मुखाग्नि देने की बात कही. मगर पंडितजी ने मना कर दिया. वही पुरानी बातें कि ऐसा करने से मृतक को मोक्ष नहीं मिलेगा, उस की आत्मा जन्मजन्मांतर तक भटकती रहेगी आदिआदि. आननफानन उन की बहन के बेटे को उन का दत्तक पुत्र बना कर अंतिम संस्कार करवाया गया. उस के बाद के क्रियाकर्म भी उसी के हाथों संपन्न करवाए गए. चाची पर गाज तो तब गिरी जब कुछ महीने बाद वह दत्तक पुत्र चाचाजी के पुश्तैनी मकान में अपना हिस्सा मांगने लगा. तब पता चला कि पंडित ने बहन से खूब दक्षिणा बटोरी थी.

आज भी हमारे देश की जनसंख्या का एक बहुत बड़ा प्रतिशत मोक्ष के जाल में उलझा हुआ है. मोक्ष यानी आत्मा का जन्मजन्मांतर के बंधन से मुक्त हो कर परमात्मा में विलीन हो जाना.

हर जगह हैं धर्म के धंधेबाज

हिंदू धर्मशास्त्रों में पितरों का उद्घार करने के लिए पुत्र की अनिवार्यता मानी गई है. गरुड़ पुराण के अनुसार, ऐसी मान्यता है कि पुत्र के हाथों पिंडदान होने से ही प्राणी मोक्ष को प्राप्त करता है. इस पुराण के अनुसार, मोक्ष से आशय है पितृलोक से स्वर्गगमन और वह पुत्र के हाथों ही संभव है. इस तथ्य में कोई सचाई नहीं है. फिर भी पढ़ेलिखे लोग भी बिना विरोध किए सदियों से चली आ रही इन परंपराओं को आंखें भींच निभाते चले आ रहे हैं. दरअसल, इन बातों को रातदिन दोहरा कर पूरे समाज को हिप्नोटाइज कर डराया जा रहा है. यह सारी दुनिया में हो रहा है क्योंकि धर्म के धंधेबाज हर जगह हैं.

पंडों, पादरियों और मौलवियों, जो अपनेआप को पृथ्वी पर ईश्वर का दूत मानते हैं, ने मृत्यु के बाद का एक काल्पनिक संसार रच दिया है लोगों के दिलोदिमाग में. अपनेआप को शास्त्रों का ज्ञाता बताने वाले इन दूतों ने हरेक कर्मकांड को धर्म से जोड़ कर यजमानों के आसपास ईश्वर के प्रकोप और अनहोनी का जाल बुन दिया है. इस जाल के तानेबाने इतने सशक्त हैं कि धर्मभीरू जनता के लिए इन्हें तोड़ना आसान नहीं. अगर कोई कोशिश भी करना चाहे तो उसे परलोक का भय दिखा कर डराया जाता है.

हरेक धर्म के अपने धर्मगुरु होते हैं. समाज का एक बड़ा तबका इन का अनुयायी होता है. इन गुरुओं की रोजीरोटी अपने यजमानों के कारण ही चलती है. जब भी यजमान को कोई परेशानी होती है, वह इन गुरुओं की शरण में आता है और गुरुजी तत्काल उस समस्या का कोई समाधान सुझा देते हैं. बदले में वे मोटी दक्षिणा वसूलते हैं. समस्या जितनी बड़ी होगी, समाधान भी उतना ही महंगा होगा.

पिछले दिनों मेरे पड़ोस में रहने वाले एक मित्र का देहांत हो गया. उन का बड़ा बेटा जो कि विदेश में रहता है, अंतिम संस्कार के समय नहीं पहुंच सका. मुखाग्नि छोटे बेटे के हाथों दिलवाई गई. मगर पगड़ी रस्म के समय पंडितजी ने कहा कि बड़े बेटे के रहते छोटे को पगड़ी नहीं पहनाई जाएगी. कुछ अतिरिक्त दक्षिणा ले कर उन्होंने उस का भी तोड़ निकाल दिया. बड़े बेटे की तसवीर को पाटे पर रख कर रस्मपगड़ी संपन्न करवाई गई.

मरने वाले को मोक्ष मिलता है या नहीं, इस का तो कोई प्रत्यक्ष प्रमाण है ही नहीं, मगर क्रियाकर्म करवाने वाले यानी पंडित के जरूर वारेन्यारे हो जाते हैं. अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए कोई भी पुत्र कुछ भी करने को तैयार हो जाता है क्योंकि उसे यह समझाया जाता है कि उस पर अपने उन पितरों का ऋण है जो उसे इस दुनिया में लाए थे. यह भी कि यह ऋण उतारना उस की नैतिक जिम्मेदारी है वरना उस के पूर्वजों की अतृप्त आत्माएं भटकती रहेंगी. मगर पुत्र ही क्यों? पुत्री भी तो इन्हीं पूर्वजों द्वारा संसार में लाई गई हैं तो पितृऋण तो उस पर भी होना चाहिए. अपने पूर्वजों के इस ऋण को उतारने के लिए पुत्र पर मानसिक दबाव बनाया जाता है, कई तरह के किस्से गढ़ कर सुनाए जाते हैं और प्राचीन शास्त्रों का हवाला दिया जाता है. कई बार तो इस ऋण को उतारने की कवायद में व्यक्ति सिर से पांव तक कर्जे में डूब जाता है. यानी पूर्वजों का ऋण उतार कर वंशजों को ऋण में डुबो देता है.

पिछले दिनों एक परिचित से मिलना हुआ. पता चला वे अपने पिताजी का श्राद्धकर्म करने के लिए गया जा रहे हैं क्योंकि पंडितजी ने पितृदोष बताया है. मेरे पूछने पर कि उन्हें कैसे पता चला कि ये पितृदोष है, तो वे बोले कि कई दिनों से परिवार में कोई न कोई बीमार हो जाता है. कभी व्यापार में घाटा हो जाता है तो कभी आपस में मनमुटाव. रोजरोज की परेशानियों से निबटने के लिए जब पंडितजी से उपाय पूछा तो उन्होंने बताया कि मेरे चाचाजी, जिन की मृत्यु ऐक्सिडैंट में हुई थी, का क्रियाकर्म उचित ढंग से नहीं हुआ, इसलिए उन की आत्मा को शांति नहीं मिल रही है और हमारे परिवार पर पितृदोष लगा है. अब इस का एकमात्र उपाय गया में उन का श्राद्ध कर्म करना ही है.

मैं ने बहुत समझाया कि अगर कोई बीमार है तो डाक्टर की सलाह लो, न कि पंडितजी की. मगर उन की आंखों पर तो पंडितजी ने धर्म की ऐसी पट्टी बांधी जो 2-3 लाख रुपए खर्च होने पर ही खुली क्योंकि गया में भव्य श्राद्धकर्म करने के बाद भी परिवार और व्यापार की स्थिति में आशातीत सुधार नहीं आया था. तब बात उन की समझ में आई मगर तब तक उन का काफी नुकसान हो चुका था.

हमारी नई वैज्ञानिक पीढ़ी जरूर इन आडंबरों से दूर है मगर यह प्रतिशत भी सिर्फ बड़े शहरों में ही अधिक देखने को मिलता है. छोटे कसबों और गांवों में अभी भी हालात अधिक बदले हुए नजर नहीं आते.

धर्म का डर

राधा की सास की मृत्यु के बाद 12 दिनों तक उन की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए पंडितजी ने कई क्रियाएं करवाईं. प्रतिदिन पंडितजी को वे सब पकवान बना कर खिलाए जाते जो उस की सास को बेहद प्रिय थे. क्योंकि शास्त्रों के अनुसार, यह सारा भोजन पंडितजी के माध्यम से उस की सास तक पहुंच रहा था और ये सारा ज्ञान पंडितजी का ही दिया हुआ था. सास तक क्या पहुंचा, क्या नहीं, मगर 12 दिन पंडितजी ने खूब तर माल उड़ाया और अपनी सेहत बनाई. साथ ही, मोटी दक्षिणा भी वसूली. राधा के परिवार को कितना कर्जा लेना पड़ा, इस से उन्हें कोई सरोकार नहीं.

दरअसल, पूजापाठ से मिलने वाली दानदक्षिणा ही प्राचीनकाल से पंडेपुजारियों के जीवनयापन का साधन रही है. जैसेजैसे लोग पढ़नेलिखने लगे, उन की सोच भी तार्किक होने लगी. ऐसे में पंडितोंमुल्लाओं का धंधा चौपट होने लगा. इसलिए यजमानों को धर्म का डर दिखाना उन के लिए जरूरी हो गया वरना उन की रोजीरोटी पर संकट खड़ा हो जाता. अब इस तरह के कर्मकांड रोज तो होते नहीं, इसलिए जब भी ऐसा मौका आता है ये ईश्वर के दूत सक्रिय हो जाते हैं और अधिक वसूलने की कोशिश करते हैं. अपने यजमानों को मोक्ष का ज्ञान देने वाले ये पंडित खुद गहरे मायाजाल में फंसे हुए हैं और अपने स्वार्थ के लिए ही इन के द्वारा ये भ्रांति और अंधविश्वास फैलाया गया है कि पुत्र ही मातापिता को मृत्यु के बाद मुक्ति प्रदान करता है. और इसी धारणा का नतीजा है आम आदमी की पुत्रचाह की मानसिकता. मोक्षप्राप्ति की लालसा में पुत्र की कामना प्राचीनकाल में जनसंख्या वृद्धि का एक अहम कारण बनी और आधुनिक काल में कन्याभू्रण हत्या का.

अलबत्ता तो मृत्यु के बाद मोक्ष की अवधारणा  ही कल्पना मात्र है और इस के लिए भी पुत्र की अनिवार्यता महज पंडोपादरियों द्वारा फैलाया गया भ्रमजाल है. ऐसा कोई काम नहीं जो पुत्र कर सके और पुत्री नहीं. आखिर हैं तो दोनों एक ही मातापिता की संतान.

हमें इन कर्मकांडों और पाखंडों के बजाय तार्किक और वैज्ञानिक सोच की आवश्यकता है. अंधविश्वास के अंधेरों से बाहर निकल कर तथ्यों की रोशनी में हकीकत देखने और समझने की जरूरत है. हालांकि मस्तिष्क में गहरे तक जड़ जमा चुके इन धार्मिक आडंबरों के जाल से बाहर निकलने के लिए बहुत हिम्मत की जरूरत है क्योंकि हो सकता है समाज का एक धड़ा आप के विरोध में उठा खड़ा हो. मगर सचाई यह भी है कि जब तक हम डरते रहेंगे, ईश्वर के तथाकथित दूत यानी पंडित लोग हमें लूटते रहेंगे. अगर हम तर्क की तलवार ले कर इन का सामना करें तो इन के फैलाए पाखंड के जाल को काट सकेंगे.

– आशा शर्मा

बिग बॉस 10 के सुल्तान बनें मनवीर गुर्जर

नोएडा के रहने वाले मनवीर गुर्जर ने वी जे बानी जज एवं ब्यूटी क्वीन लोपामुद्रा राउत को पीछे छोड़ते हुए ‘बिग बॉस’ का 10 वां सीजन जीत लिया है. बानी इस रियलिटी शो में पहली रनर अप रहीं जबकि लोपामुद्रा दूसरी रनरअप रहीं.

मनवीर के सबसे अच्छे दोस्त और बिग बॉस के घर में मजबूत दावेदार माने जा रहे मनु पंजाबी चौथे स्थान पर रहे. उन्होंने 10 लाख रूपये लेकर बिग बॉस का घर छोड़ने के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और बाहर आ गए.

मनवीर शुरुआत के कुछ हफ्ते बाद से ही दर्शकों के पसंदीदा कंटेस्‍टेंट बन गये थे. शो जीतने के बाद मनवीर ने कहा, ‘अब मैं काफी खुश महसूस कर रहा हूं. मैंने इस सफर का आनंद लिया, अपने तरीके से लड़ाई लड़ी और अब एक विजेता के रूप में यहां बैठा हुआ हूं. मुझे लगता है कि मैंने सब कुछ अपने दिल से किया. यह ईमानदार होने का नतीजा है.’

खिताब के साथ, मनवीर को 40 लाख रूपये का ईनाम भी मिला. इस राशि में से मनवीर के पिता ने 50 प्रतिशत राशि कार्यक्रम के प्रस्तोता सलमान खान की संस्था ‘बीइंग ह्यूमन’ को दान में देने का संकल्प जाहिर किया.

जानें मनवीर के बारे में कुछ दिलचस्‍प बातें…

1. मनवीर दिल्‍ली के नोएडा के अगाहपुर के रहनेवाले हैं. उनका असली नाम मनोज कुमार बैसोया है. उनका जन्‍म 13 जून 1987 को हुआ था.

2. मनवीर ने ग्रेजुएशन की पढ़ाई दिल्‍ली यूनिवर्सिटी से की है. मनवीर 49 लोगों की ज्‍वाइंट फैमिली में रहते हैं.

3. मनवीर एक किसान हैं और डेयरी चलाते हैं, इसके साथ-साथ वे एक सामाजिक कार्यकर्ता भी है. उन्‍होंने नोएडा में गुर्जर सोसाइटी के सुधार के लिए आम आदमी पार्टी से भी हाथ मिलाया है.

4. मनवीर रेसलिंग और कबड्डी के शौकीन हैं. वे अपनी फिटनेस पर खासा ध्‍यान देते हैं साथ ही उन्‍हें हर तरह के खेल पसंद है.

5. सलमान के फेवरेट अभिनेता सलमान खान हैं. बिग बॉस के होस्‍ट और बॉलीवुड के सुपरस्‍टार सलमान खुद भी कई बार शो में मनवीर की तारीफ कर चुके हैं.

6. मनवीर का परिवार बहुत बड़ा है और वे अपने परिवार से बेहद प्‍यार करते हैं. मनवीर एक बेहद भावुक इंसान हैं जिसकी झलक बिग बॉस हाउस में भी देखने को मिली थी. कई बार परिवार का नाम आने पर उनकी आंखें नम हो जाती थी.

हौसला ही काफी है, ऊंची उड़ान के लिए

दुनिया को कुछ हिस्सों में बांटा गया है. किन हिस्सों में? कभी सोचा है? देश, राज्य, धर्म, जातियों में नहीं, पर दुनिया को बड़े करीने से सिर्फ दो हिस्सों में बांटा गया है. चौंकिए मत, चाहे कोई भी देश हो, राज्य हो या कोई भी धर्म हिस्से तो सिर्फ दो ही हैं. एक पुरुष और एक स्त्री. दुनिया को बांटने के साथ ही पुरुषों और स्त्रियों के काम काज को भी बांट दिया गया था.

पुरुषों का काम है घर से बाहर जाकर काम काज करना और स्त्रियों का काम है घर संभालना, घर की देखभाल करना. नि:स्वार्थ भाव से काम करने के बावजूद कोई पगार तो दूर कितने लोग तो स्त्रियों के काम की कद्र ही नहीं करते. पुरुष का काम है घर के लिए पैसे कमाना. मतलब पुरुष का काम है घर के लिए आटे का जुगाड़ करना, और पुरुषों का ही काम है आटे की कंपनी चलाना, पर स्त्रियों का काम है उस आटे से कुछ खाने लायक बनाना. इसके अतिरिक्त कुछ करना.

पर इतिहास गवाह है कि समय समय पर इस मानसिकता को कई स्त्रियों ने चुनौति दी है. आज जानते हैं ऐसी ही कुछ स्त्रियों के बारे में जिन्होंने पितृसत्तामक समाज के खिलाफ जाकर अपनी पहचान बनाई.

1. कोको चैनल (Gabrielle ‘Coco’ Channel)

फैशन की दुनिया में ‘चैनल’ ब्रांड का अलग ही रुतबा है. गैब्रिएल ‘कोको’ चैनल एक मामूली हैट डिजाइनर थी. पर अपनी प्रतिभा से उन्होंने फ्रांस के संपन्न परिवारों के बीच अपनी जगह बनाई. उनके खूबसूरत डिजाइन के हैट लोगों को खूब पसंद आए. उन्होंने फोर्बस की ‘20वीं सदी की 100 सबसे मश्हूर हस्तियों’ में अपनी जगह बनाई. प्रथम विश्वयुद्ध के बाद औरतों को कोरसेट(corset) के चंगुल से छुड़ाने का श्रेय भी कोको को ही जाता है.

2. शर वैंग (Cher Wang)

शर वैंग ‘HTC’ की सह संस्थापक और चेयरपर्सन हैं. शर को तकनीक की दुनिया में सबसे सफल और शक्तिशाली महिला कहा जाता है. इतनी शौहरत के बावजूद शर लाइमलाइट और चकाचौंध की दुनिया से दूर रहती हैं. एक सफल बिजनेसवुमन होने के साथ साथ शर चैरिटी के कामों से भी जुड़ी हैं.

3. रुथ हैंडलर (Ruth Handler)

बार्बी डौल तो देखी होगी आपने? हर छोटी बच्ची के पास ये डौल होती है. हर बच्ची की जिन्दगी में बार्बी को लाने का श्रेय रुथ को जाता है. अपनी बेटी बार्बरा को देखकर उन्हें बार्बी डौल बनाने का आइडिया आया. बार्बी डौल आज भी कई लिविंग रूम क्लोसेट की शान है.

4. एरियाना हफिंगटन (Arianna Huffington)

एरियाना ‘The Huffington Post’ अखबार की सह संस्थापक हैं. 2016 में उन्होंने हफिंगटन पोस्ट से इस्तीफा दे दिया पर मीडिया के फिल्ड में उनके नाम का सिक्का चलता है. उन्होंने 70 के दशक में कई चर्चित किताबें लिखी. उन्होंने पिकास्सो की बायोग्राफी भी लिखी.

5. किरण मजुमदार शॉ (Kiran Mazumdar Shaw)

किरण ने ‘बायोकॉन लिमिटेड’ की स्थापना की थी. कहा जाता है कि उन्हें कंपनी खोलने की जगह नहीं मिली थी तो उन्होंने एक गराज से ही कंपनी की शुरुआत की. आज बायोकॉन बायोमेडिसीन रिसर्च की एक जानीमानी कंपनी है.

6. वंदना लुथरा (Vandana Luthra)

वंदना लुथरा ने ‘VLCC Health Care Ltd’ की स्थापना की. आज VLCC के प्रोडक्ट्स ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड समेत 11 देशों में खरीदे जाते हैं. देश में VLCC के कई स्टोर्स हैं.

7. एकता कपूर (Ekta Kapoor)

आप एकता को पसंद या नापसंद कर सकती हैं. पर उन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकती. भारतीय टेलीविजन का चेहरा बदलने का श्रेय इन्हीं को जाता है. एकता ने ‘बालाजी टेलीफिल्म्स’ की स्थापना की. उनके प्रोडक्शन हाउस से कई ऐसे डेली सोप बनें जो भारत में कई घरों का हिस्सा बन गए. दोपहर में घर पर अकेले रहने वाली स्त्रियों को एकता ने क्योंकि सास भी कभी बहू थी, कहानी घर घर की जैसे सीरियल का तोहफा दिया.

इन एक्टर्स ने बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट बॉलीवुड में की शुरुआत

बॉलीवुड में ऐसे कई एक्टर्स हैं जिन्होंने बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट अपने करियर की शुरुआत की. इनमें से कुछ हिट हुए तो कुछ फ्लॉप. कुछ ने सफलता का मिला-जुला स्वाद चखा. इन एक्टर्स ने करियर की शुरुआत बॉलीवुड से की और बड़े होकर भी एक्टिंग की फिल्ड में ही नाम कमाया.

आइए जानते हैं किन एक्टर्स ने बचपन में ही एक्टिंग में आजमाया हाथ.

आफताब सिवदेसानी

अपने डिंपल और गुड लुक्स के लिए जाने वाले आफताब ने बॉलीवुड में चाइल्ड आर्टिस्ट के रूप में करियर की शुरुआत की थी. आफताब जब 14 महीने के थे तभी उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक टीवी कमर्शियल बेबी फूड से की थी. बतौर चाइल्ड एक्टर आफताब ने 1987 में आई फिल्म ‘मिस्टर इंडिया’ से बॉलीवुड में कदम रखा था. 1999 में राम गोपाल वर्मा की फिल्म ‘मस्त’ में पहली बार लीड रोल निभाया. इतना ही नहीं 2009 में आफताब ने मुंबई में खुद का प्रोडक्शन हाउस ‘राइजिंग सन एंटरटेनमेंट’ भी शुरू किया.

आएशा टाकिया

ग्लैमरस एक्ट्रेस आएशा टाकिया ने कॉम्पलैन के विज्ञापन से अपने अभिनय की दुनिया में कदम रखा. शायद ही कोई होगा जो इस कॉम्प्लैन गर्ल को नहीं जानता होगा. बतौर लीड एक्ट्रेस आएशा ने फाल्गुनी पाठक के म्यूजिक वीडियो ‘मेरी चुनर उड़ उड़ जाए’ में काम किया था. वो साल 2004 में ‘टार्जन द वंडर कार’ में लीड रोल में नजर आईं. अब तक वह सलमान, शाहिद कपूर, अजय देवगन जैसे सुपरस्टार्स के साथ काम कर चुकी हैं.

शाहिद कपूर

आएशा टाकिया की तरह शाहिद ने अपने अभिनय करियर की शुरुआत कॉमप्लैन ब्वॉय की तरह किया. म्यूजिक वीडियो ‘आंखों में’ आप चाह कर भी शाहिद को नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं. फिल्म ‘इश्क-विश्क’ से उनहोंने बॉलीवुड में डेब्यू किया.

उर्मिला मातोंडकर

उर्मिला ने 6 साल की उम्र में फिल्म ‘कलयुग’ से अपने एक्टिंग करियर की शुरूआत की थी. लेकिन इस रंगीला गर्ल को फिल्म ‘मासूम’ से बाल कलाकार के रुप में पहचान मिली. मासूम उन्होंने 9 साल की उम्र में की थी. 1991 में आई फिल्म ‘नरसिम्हा’ से उर्मिला ने युवा कलाकार की तरह अपने करियर की शुरुआत की. 1995 में रिलीज हुई फिल्म ‘रंगीला’ से उन्हें बॉलीवुड में पहचान मिली.

इमरान खान

‘जाने तू या जाने ना’ फेम एक्टर इमरान खान ने फिल्म ‘कयामत से कयामत तक’ से बतौर बाल कलाकार अपने बॉलीवुड करियर की शुरुआत की थी. फिल्म ‘जो जीता वही सिकंदर’ और ‘कयामत से कयामत तक’ में आमिर खान के बचपन का किरदार निभाया था. युवा कलाकार के रूप में इमरान ने साल 2008 में फिल्म ‘जाने तू या जाने ना’ से बॉलीवुड में डेब्यू किया था.

हंसिका मोटवानी

टीवी सीरियल ‘शका लका बूम बूम’ और ‘देश में निकला होगा चांद’ में चाइल्ड आर्टिस्ट का किरदार निभाने के बाद हंसिका ने बॉलीवुड में कदम रखा. 2003 में आई फिल्म ‘हवा’ से उन्होंने अपने बॉलीवुड करियर की शुरुआत की. फिल्म ‘कोई मिल गया’ में उन्हें खुब पसंद किया गया. हिमेश रेशमिया की फिल्म ‘आपका सुरूर’ में लीड रोल निभाया और बतौर बॉलीवुड एक्ट्रेस अपनी पहचान बनाई.

आमिर खान

बॉलीवुड की एवरग्रीन फिल्मों में से एक है ‘यादों की बारात’. और इसी फिल्म से बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट ने महज 7 साल की उम्र में एक्टिंग की शुरुआत की. फिल्म ‘कयामत से कयामत तक’ में उन्होंने पहली बार लीड रोल निभाया था.

सना सईद

‘कुछ कुछ होता है’ कि अंजली तो आपको याद ही होगी. आज की हॉट एक्ट्रेस सना सईद ने ‘कुछ कुछ होता है’ में रानी मुखर्जी और शाहरुख कान की बेटी अंजली का किरदार निभया था. सना चाइल्ड एक्टर के रूप में फिल्म ‘हर दिल जो प्यार करेगा’ में भी नजर आईं. युवा कलाकार के तैर पर सना ने ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ से अपने करियर की शुरुआत की.

श्रीदेवी

बॉलीवुड की पहली फीमेल सुपरस्टार श्रीदेवी ने भी अपने करियर की शुरुआत चाइल्ड एक्ट्रेस के रूप में ही किया था. सिर्फ 4 साल की उम्र में ही श्रीदेवी ने अपने एक्टिंग करियर की शुरुआत कर दी थी. सिर्फ हिंदी नहीं श्रीदेवी ने तमिल, कन्नड़, तेलगु, मलयालम फिल्मों में भी अपने एक्टिंग का परचम लहराया. उन्होंने 1975 में आई फिल्म ‘जूली’ से बॉलीवुड में बतौर चाइल्ड एक्ट्रेस एंट्री ली. ‘सोलवा सावन’ में उन्होंने पहली बार एडल्ट रोल निभाया. फिल्म ‘हिम्मतवाला’ ने उन्हें रातोरात स्टार बना दिया.

कुनाल खेमु

कुनाल को लोग आज भी फिल्म ‘राजा हिंदुस्तानी’ और ‘हम हैं राही प्यार के’ के बाल कलाकार के रुप में याद करते हैं. 1980 के दशक के वे फेमस बाल कलाकार थें. कुनाल ने अपने एक्टिंग करियर की शुरुआत दुरदर्शन के सीरियल ‘गुल गुलशन गुलफाम’ से की थी. बतौर युवा कलाकार उन्होंने महेश भट्ट की फिल्म ‘सर’ से बॉलीवुड में डेब्यू किया.

नीतू सिंह

नीतू ने महज 8 साल की उम्र में फिल्मों में अपना कदम जमा लिया था. उन्होंने पहली बार फिल्म ‘दो कलियां’ में चाइल्ड एक्ट्रेस के रूप में काम किया. 1972 में आई फिल्म ‘रिक्शेवाला’ में उनहोंने लीड रोल निभाया था. फिल्म ‘यादों की बारात’ से उन्होंने बॉलीवुड में नाम कमाया.

ऋषि कपूर

राज कपूर की फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ से ऋषि ने अभिनय की दुनिया में कदम रखा था. इस फिल्म में उन्होंने राज कपूर के बचुन का किरदार निभाया था. लीड रोल में ऋषि ने सबसे पहले फिल्म ‘बॉबी’ में अभिनय किया और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.

रितिक रोशन

रितिक ने फिल्म ‘आशा’ से अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की. इस फिल्म में उन्होंने एक डांस सीक्वेंस किया था. युवा कलाकार की तरह उन्होंने फिल्म ‘कहो ना प्यार है’ से अभिनय की दुनिया में कदम रखा.

अभिनेत्रियां जिन्होंने कम उम्र में जिन्दगी को कहा अलविदा

कुछ अभिनेत्रियों का करियर छोटा जरूर था पर ये विश्वास अब भी सभी को है कि उन सभी में अपने जीवन में, और बहुत कुछ करने की काबिलियत थी. बहुत ही कम उम्र में जिन्दगी को अलविदा कह देने वाली इन अदाकाराओं ने सभी दर्शकों  के दिलों में एक छाप छोड़ी, जो निस्संदेह आज भी बरकरार है.  

सूत्रों की माने तो ऐसी सभी अभिनेत्रियों की दुखद मौत का कारण शराब, उनका डिप्रेशन या उनके जीवन का कोई बड़ा दुख हो सकता है. कुछ खूबसूरत अभिनेत्रियां जिन्होंने कम उम्र में अपनी जिन्दगी को खो दिया, उन पर एक नजर..

दिव्या भारती

90 के दशक की एक उभरती अदाकारा दिव्या भारती, मात्र 19 साल की उम्र में उनके जीवन का दुखद अंत आज भी एक राज बना हुआ है. उनकी मौत वाकई एक दुर्घटना थी या आत्महत्या ये बात, आज भी एक राज बनी हुई है. अभिनेत्री दिव्या भारती की मौत 5 अप्रैल 1993 की रात मुंबई में हुई, जब एक पांच मंजिला अपार्टमेंट से उनका संतुलन बिगड़ा और वे नीचे गिर गईं. कई लोगों का मानना था कि उन्होंने आत्महत्या की थी, वहीं यह संभावनाऐं भी लगाई जा रहीं थी कि ये हत्या को आत्महत्या दिखाने के लिए उनके खिलाफ कोई साजिश भी हो सकती है. उस वक्त मुंबई पुलिस उनकी मौत के पीछे होने वाले मुख्य कारणों का पता लगाने और पर्याप्त सबूत इकट्ठा करने में विफल रही और अंत में साल 1998 में आगे की जांच बंद कर दी गई.

जिया खान

अमिताभ बच्चन के साथ 2007 में फिल्म नि:शब्द से एक बड़ा डेब्यू करने वाली अभिनेत्री जिया खान के बारे में कहा जाता है कि जिया अपने असफल फिल्म करियर और अपनी लव लाईफ से काफी परेशान थीं. इन सभी चीजों ने मिलकर जिया को अंदर तक तोड़ दिया था और शायद इन्हीं परेशानियों से बचने के लिए, साल 2013 की शुरुआत में 25 साल की जिया खान ने मुंबई स्थित अपने अपार्टमेंट में आत्महत्या कर ली थी.

मधुबाला

पुराने समय की सबसे खूबसूरत अभिनेत्रियों में से एक हैं अभिनेत्री मधुबाला. 36 साल की उम्र में दिल की गति रुकने के कारण उनकी मृत्यु हो गई थी. मधुबाला एक प्रतिष्ठित अभिनेत्री थीं, तकरीबन दो दशकों तक उनका एक सफल करियर हिन्दी सिनेमा पर छाया रहा. जन्म से ही मधुबाला के हृदय में छेद था जो अंत में उनकी मौत का कारण भी बना.

सौंदर्या

100 से भी अधिक फिल्मों में काम करने वाली सौंदर्या एक दक्षिण भारतीय अभिनेत्री थीं. साल 2004 में बंगलुरु के पास एक विमान दुर्घटना में सौंदर्या की मृत्यु हो गई थी. अपनी मौत से कुछ वक्त पहले ही सौंदर्या ने दक्षिण में फिल्म निर्माण का कार्य शुरु किया था. खूबसूरत अभिनेत्री सौंदर्या का निधन मात्र 32 साल की उम्र में हो गया था.

स्मिता पाटिल

भारतीय सिनेमा में अभिनेत्री स्मिता पाटिल अब तक की सबसे टैलेन्टेड अभिनेत्रियों की लिस्ट में शुमार हैं. मंथन, भूमिका और मिर्च मसाला जैसी बेहतरीन फिल्में देने वाली स्मिता केवल 31 साल की उम्र में अपनी जिन्दगी को अलविदा कह गईं. साल 1986 में स्मिता के जीवन का अंत एक दुखद घटना थी. अपने बेटे को जन्म देने के 2 हफ्ते बाद उनका निधन हो गया था. स्मिता पाटिल के बेटे प्रतीक बब्बर हैं जो आज के समय के एक अच्छे अभिनेता हैं.

राजिम: सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 45 किलोमीटर दूर स्थित राजिम शहर को देवालयों की नगरी भी कहा जाता है क्योंकि यहां जहां भी आप की नजर जाएगी कोई न कोई मंदिर जरूर नजर आएगा. राजिम की तुलना छत्तीसगढ़ के लोग प्रयाग से करते हैं क्योंकि यहां राज्य की 3 प्रमुख नदियों पैरी-महानदी-सोढूर का संगम होता है.

दक्षिण कोसल के नाम से भी प्रसिद्ध राजिम प्राचीन सभ्यता के लिए तो जाना ही जाता है, संस्कृति और कलाओं के महत्त्व के लिहाज से यह शहर इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और कलाप्रेमियों के आकर्षण व जिज्ञासा का विषय हमेशा से रहा है.

छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल के अथक प्रयासों के चलते अब बड़ी तादाद में सैलानी भी यहां आने लगे हैं. खासतौर से हर साल आयोजित होने वाले मेले राजिम कुंभ में तो देशभर से लोग यहां आते हैं. यहां विदेशी पर्यटकों का दिखना एक सुखद अनुभूति है. यह आयोजन प्रतिवर्ष माघ महीने की पूर्णिमा से प्रारंभ हो कर महाशिवरात्रि पर संपन्न होता है.

छत्तीसगढ़ की गंगा कही जाने वाली नदी महानदी के किनारे बसे प्रमुख शहरों में से एक राजिम को ले कर किवदंतियों की भरमार है. शिलालेखों का यहां अपना अलग ऐतिहासिक महत्त्व है. रतनपुर के कलचुरी राजा नरेश जाजल्य प्रथम एवं रत्नदेव द्वितीय की युद्घविजयी गाथाएं इन शिलालेखों में उल्लिखित हैं.

भारतीय स्थापत्यकला और मूर्तिकला के इतिहास में छत्तीसगढ़ अंचल का योगदान क्या और कितना है, यह राजिम स्वयं सिद्घ करता है. सामान्य सर्वेक्षणों में राजिम में बड़ी तादाद में मृण्मय अवशेष मिलते हैं जिन के आधार पर यहां के सांस्कृतिक अनुक्रम का अनुमानित कालक्रम निर्धारित होना संभव हो पाया.

राजिम के देवालयों के निर्माण का समय 7वीं से ले कर 14वीं शताब्दी के बीच हुआ, ऐसा माना जाता है. प्रसिद्घ राजीव लोचन मंदिर का भूविन्यास महामंडप, अंतराल गर्भगृह और प्रदक्षिणापथ 4 भागों में बंटा हुआ है. राजिम के कुछ स्थानों पर शाल भंजिका की भी मूर्ति है. कहींकहीं खजुराहो जैसे आलिंगनबद्घ मूर्तियां भी दिखती हैं.

राजिम कुंभ, पर्यटकों को यहां के इतिहास के बारे में जानने का बड़ा मौका भी होता है. रायपुर से बस या टैक्सी द्वारा राजिम आसानी से पहुंचा जा सकता है.      

टौप 5 कलरफुल मसकारा

आईलाइनर और आईशैडो ही नहीं, मार्केट में यलो से ले कर ब्लू, पिंक से ले कर ग्रीन शेड के मसकारों के कलैक्शन में कोई कमी नहीं है. ऐसे में अगर आप भी नियमित ब्लैक और ट्रांसपैरेंट शेड का मसकारा लगा कर ऊब चुकी हैं, तो एक बार कलरफुल मसकारा जरूर ट्राई करें. मसकारा के कलरफुल शेड्स आंखों को बिग और ब्राइट लुक देते हैं. ब्लैक मसकारे के मुकाबले ये काफी आकर्षक भी नजर आते हैं, बशर्ते इन का चुनाव करते वक्त अपनी स्किनटोन के साथसाथ आंखों के रंग का भी खास खयाल रखा जाए.

ब्लू मसकारा

अगर आप की आंखों का रंग ग्रे, ब्राउन या लाइट ग्रीन है, तो आप अपने वैनिटी बौक्स में ब्लू शेड का मसकारा रख सकती हैं. मार्केट में ब्लू के कई शेड्स का मसकारा उपलब्ध है जैसे रौयल ब्लू, नेवी ब्लू, सी ब्लू आदि. ब्लू के ये सारे शेड्स फेयर कौंप्लैक्शन वाली महिलाओं पर ही नहीं, बल्कि डार्क और मीडियम कौंप्लैक्शन वाली महिलाओं पर भी सूट करते हैं, लेकिन ब्लू शेड का मसकारा नाइट के बजाय डे पार्टी में ज्यादा उभरा नजर आता है.

ग्रीन मसकारा

डार्क ब्राउन शेड्स की आंखों में ग्रीन शेड का मसकारा बेहद खूबसूरत नजर आता है. लेकिन बात यदि स्किनटोन की करें तो ब्लू की तरह ग्रीन कलर का मसकारा भी डार्क, फेयर, मीडियम हर तरह की स्किनटोन वाली महिलाओं पर फबता है. अगर आप चाहती हैं कि आप का ग्रीन मसकारा उभरा नजर आए, तो जब भी ग्रीन कलर का मसकारा लगाएं, उस के साथ डार्क शेड का आईशैडो या आईलाइनर लगाने की भूल न करें वरना डार्क शेड के आगे आप के मसकारे का रंग फीका पड़ सकता है.

ब्राउन मसकारा

ब्लैक के तुरंत बाद कलरफुल मसकारा लगाने से झिझक महसूस कर रही हैं तो शुरुआत ब्राउन मसकारे से करें. यह ब्लैक शेड्स से थोड़ा लाइट होता है, लेकिन इस का इफैक्ट काफी नैचुरल नजर आता है. मीडियम और फेयर कौंप्लैक्शन वाली महिलाओं के साथ ही ब्राउन आंखों वाली महिलाओं पर भी ब्राउन शेड का मसकारा काफी खूबसूरत दिखता है. इसे पार्टी, फंक्शन जैसे खास मौकों के साथसाथ रोजाना भी लगाया जा सकता है. यह दिन रात दोनों समय आकर्षक नजर आता है.

गोल्डन मसकारा

अगर आप किसी नाइट पार्टी की जान बनना चाहती हैं तो ग्रीन, ब्लू, पर्पल जैसे शेड्स के मसकारे को छोड़ कर गोल्डन शेड का मसकारा चुन सकती हैं. यह हर शेड की आंखों पर बेहद खूबसूरत नजर आता है. डार्क से ले कर मीडियम और फेयर स्किनटोन वाली महिलाओं पर भी गोल्डन शेड का मसकारा जंचता है यानी बाकी शेड्स का मसकारा रखें या न रखें, लेकिन पार्टी की जान बनने के लिए गोल्डन शेड के मसकारे को अपने वैनिटी बौक्स में जरूर खास जगह दें.

पर्पल मसकारा

अगर आप की आंखें छोटी हैं और आप उन्हें बिगर लुक देना चाहती हैं, तो आंख मूंद कर पर्पल शेड के मसकारे को अपने मेकअप बौक्स में रख लें. ये ग्रीन, ब्राउन और ब्लू कलर की आंखों पर ज्यादा सूट करता है. इस के खासकर 3 शेड ज्यादा इस्तेमाल किए जाते हैं- रौयल पर्पल, प्लम और वायलेट. अगर आप की स्किनटोन डार्क है तो पर्पल शेड का मसकारा खरीदें. अगर फेयर है तो वायलेट शेड और मीडियम है तो प्लम शेड चुन सकती हैं. नाइट के मुकाबले पर्पल शेड का मसकारा डे पार्टी में काफी खूबसूरत लुक देता है.   

सुपर स्टाइलिश आइडियाज

– आर्टिफिशियल आईलैशेज लगा कर मसकारा लगाएं. लंबीघनी पलकों पर लगा मसकारा बेहद खूबसूरत नजर आता है.

– सुपर स्टाइलिश लुक के लिए जिस शेड का मसकारा लगा रही हैं, उसी शेड का आईशैडो लगाएं.

– एक ही शेड का मसकारा और आईलाइनर लगा कर भी आप अपनी आंखों को आकर्षक लुक दे सकती हैं.

– ड्रामैटिक आई मेकअप के लिए 2 डिफरैंट शेड्स का मसकारा लगाएं, जैसे ऊपर की आईलैशेज पर ब्लू और नीचे की आईलैशेज पर ग्रीन.

– ट्रैंड सैटर कहलाने के लिए आईलैशेज को 3 भागों में बांट दें और फिर तीनों पर अलग अलग 3 शेड्स का मसकारा लगाएं.

– अगर नाइट पार्टी में जा रही हैं तो ग्लिटर वाला कलरफुल अप्लाई करें. इसे लगाने से आप का आई मेकअप कलरफुल भी नजर आएगा और चमक भी उठेगा.

– चूंकि आप कलरफुल मसकारे से आईर् मेकअप को हैवी लुक दे रही हैं, इसलिए लिपस्टिक और ब्लशऔन के लिए नैचुरल शेड्स का चुनाव करें वरना आप का लुक गौदी नजर आ सकता है.

जब लगाएं मसकारा

– अगर आप चाहती हैं कि आप का मसकारा लौंग लास्टिंग रहे तो वाटरप्रूफ मसकारा खरीदें.

– मसकारा पहले ऊपर की आईलैशेज पर फिर निचली आईलैशेज पर लगाएं.

– मसकारा लगाते वक्त आईलैशेज को घुमा कर ऊपर की तरफ ले जाएं. इस से पलकें घनी नजर आती हैं.

– मसकारे को हवा के संपर्क में न आने दें वरना वह सूख कर जल्दी खराब हो सकता है.

– अच्छे परिणाम के लिए मसकारे का सिंगल नहीं, डबल कोट लगाएं.

– सोने से पहले मसकारा रिमूव करना न भूलें वरना आप की आईलैशेज कमजोर हो सकती हैं.

लेंस लगाने के बाद ऐसे करें आई मेकअप

अक्सर लड़कियां इसलिए कॉन्टैक्ट लेंस लगाना अवॉइड करती हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इसके बाद आंखों में काजल और मस्कारा नहीं लगा पाएंगी. पर ऐसा नहीं है. आप इसके बाद भी पूरा आई मेकअप कर सकती हैं, बस जरूरी है इसके बाद कुछ बातों का ध्यान रखना…

मेकअप बाद नहीं, पहले लगाएं कॉन्टैक्ट लेंस

पहले कॉन्टैक्ट लेंस लगा लें और उसके बाद मेकअप करें. गलती से भी पहले आंखों का मेकअप न करें. इससे लेंस लगाते समय लेंस के साथ काजल और मस्कारा जैसी चीजें लेंस पर लगकर आंखों में जा सकती हैं.

इससे आंखों से पानी आने के साथ जलन भी हो सकती है. लेकिन अगर आप मेकअप करने से पहले कॉन्टैक्ट लेंस लगाती हैं, तो आपकी आंखों को किसी तरह का नुकसान नहीं होगा और मेकअप भी बरकरार रहेगा.

इन बातों का रखें ख्याल

आई लाइनर लगाते समय भी आंखों का खास ख्याल रखना चाहिए क्योंकि कई बार वह आपकी आंखों के अन्दर चला जाता है, जिससे आपकी आखों में जलन होने लगती हैं और आंखो में पानी आने लगता हैं और इन सभी से आपके लेंस पर प्रभाव पड़ता हैं. तो आप जब भी आई लाइनर लगाएं, तो उसे अपनी आंखों की वॉटरलाइन पर ही लगाए. कई बार यह आंखों में इन्फेक्शन की वजह भी बन जाता है. इसलिए हाथों को धोने के बाद उन्हें सूखा लें.

आई शैडो

अगर आप कॉन्टैक्ट लेंस लगाती हैं, तो अच्छा होगा कि आप पाउडर आई शैडो के बजाय क्रीम आई शैडो का इस्तेमाल करें. पाउडर आई शैडो की तुलना में क्रीम आई शैडो ज्यादा देर तक आंखों पर बना रहता है. इतना ही नहीं, यह किसी भी तरह से आपकी आंखों को नुकसान नहीं पहुंचाता है. जबकि पाउडर आई शैडो को लेकर अक्सर लोगों को इस बात की परेशानी होती हैं कि उससे आंखों में इन्फेक्शन हो जाता है.

इन्फेक्शन से बचने के लिए

अक्सर हम लेंस लगाते समय लेंस को उंगलियों पर लेते हैं और उसे आंख पर लगा लेते हैं, जबकि यह तरीका पूरी तरह गलत है. दरअसल, लेंस लगाने से पहले जरूरी है हाथों को अच्छी तरह से साफ करना. हाथ साफ नहीं करेंगे, तो हाथों की सारी गंदगी लेंस पर लग जाएगी. गंदा लेंस जब आंख पर लगेगा, तो जलन होना तय है.

क्या आपको भी नहीं लगती है भूख!

क्या आपको भी भूख नहीं लगती, अगर हां तो आप कुछ कुदरती नुस्खें अपनाकर अपनी भूख बढ़ा सकती हैं. मुनक्का के सेवन से आप अपनी भूख बढ़ा सकती हैं.

जानिए मुनक्का के सेवन के फायदे…

1. अगर आपको भूख कम लगती है तो रात को दूध में 30-40 मुनक्‍का को उबालकर नियमित रूप से पीएं भूख बढ़ जाएगी. इससे शरीर की कमजोरी भी दूर होगी.

2. कई बार कब्ज की वजह से भी भूख नहीं लगती है. कब्ज बहुत ज्यादा है तो मुनक्का के दूध के साथ ईसबघोल भी मिला लें. इससे कब्ज भी दूर होगी और पेट भी साफ रहेगा.

3. जिन लोगों को बार-बार घबराहट होती है और हृदय में दर्द होता है तो उनके लिए भी रामबाण है मुनक्का.

4. 8 से 10 मुनक्का को 2 लौंग के साथ पानी में उबालें. बाद में मुनक्का को पीसकर छानकर चाय की तरह पीएं. ये नुस्खा डायबिटीज के मरीजों के लिए भी अच्छा है.

“मैंने हमेशा नई चुनौतियां स्वीकार की”

फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ से चर्चा में आयी अदाकारा हुमा कुरैशी ने अच्छी खासी शोहरत बटोर ली है. उनकी ‘एक थी डायन’ जैसी इक्का दुक्का फिल्मों को नजरंदाज कर दें, तो अब तक प्रदर्शित सभी फिल्में सुपरहिट रही हैं. हुमा इन दिनों जोश खरोश से भरी नजर आती हैं. इसकी वजह भी है. हुमा कुरैशी की अक्षय कुमार के साथ आने वाली फिल्म ‘जॉली एलएलबी 2’ 17 फरवरी को प्रदर्शित होने जा रही है. जबकि उनकी पहली अंतरराष्ट्रीय फिल्म ‘वायसराय हाउस’  मार्च माह में प्रदर्शित हो रही है.

अब तक के अपने करियर की यात्रा को किस तरह से देखती हैं?

बहुत ही अच्छा लग रहा है. मैंने कभी सोचा नहीं था कि बॉलीवुड में मुझे इतनी जल्दी इतनी सफलता मिल सकेगी. पर पांच साल के अंदर बहुत कुछ रोचक तरीके से बदल गया है. सबसे बड़ी बात यह है कि मुझे हर फिल्म में एकदम अलग तरह के किरदार निभाने के मौके मिले और हर बार लोगों ने मुझे पसंद किया. यूं तो काम करते हुए मजा आ रहा है. लेकिन जब भी मेरे पास नयी फिल्म का ऑफर आता है, तो मुझे इस बात का ख्याल रखना पड़ता है कि मैं कुछ नया कैसे करूंगी. वैसे भी अब सिनेमा काफी बदल चुका है. एक कलाकार के तौर पर मैं इस बात में यकीन करती हूं कि वह काम करो, जो आपको चुनौती दे. मैंने हमेशा नई नई चुनौतियां स्वीकार की हैं. मेरे लिए हर दिन रोचक होना जरुरी है.

संघर्ष के दिन तो याद आते ही होंगे?

आज मैं जिस मुकाम पर पहुंची हूं, वहां तक पहुंचने के लिए मुझे बड़ी मेहनत करनी पड़ी है. मुझे अच्छी तरह से याद है कि मुझे मुंबई में अपने करियर को बनाने के लिए मेरे पिता ने मुझे सिर्फ एक वर्ष का समय दिया था. बॉलीवुड के बारे में सभी को पता है कि यहां किस ढंग से काम होता है. मैंने तमाम रिजेक्शन सहे. ऑडिशन के लिए लंबी कतारों में खड़ी हुई हूं. पर मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है. अंततः मेरी मेहनत मेरे अंदर के अभिनय क्षमता ने मुझे सफलता दिला दी.

आपको नहीं लगता कि गैंग्स ऑफ वासेपुर से जिस अंदाज में आपका करियर शुरू हुआ था, उसे देखते हुए तो आपका करियर काफी आगे जाना चाहिए था?

पता नहीं, सर! पर यदि आपको ऐसा लगता है, तो मैं इससे बहुत खुश हूं. आपकी बातों से यह जाहिर होता है कि मेरी क्षमता में आपको विश्वास है. मैंने भी अपनी तरफ से बेहतर काम करने की कोशिश की. मैं किसी भी तरह की प्लानिंग करने में यकीन नहीं करती. मेरे पास जिन फिल्मों के ऑफर आते हैं, उनमें से जो फिल्में मुझे पसंद आती हैं, वह मैं कर लेती हूं. जिनका कथानक मुझे पसंद नहीं आता, उन्हें मैं नहीं करती. मुझे उम्मीद है कि ‘जॉली एलएलबी 2’ के प्रदर्शन के बाद स्थितियां बदलेंगी.

जॉली एलएलबी 2’ करने के लिए किस बात ने आपको इंस्पायर किया?

इसकी कहानी बहुत अच्छी है, फिर मुझे सुभाष कपूर के साथ काम करना था. इस फिल्म के हीरो अक्षय कुमार हैं, जिनके साथ मुझे काम करना था. मैं अक्षय कुमार से काफी प्रभावित हूं. वह पिछले कुछ वर्षों से एक के बाद एक बहुत ही अच्छी अलग तरह की फिल्में कर रहे हैं. वह चरित्रों को पकड़ कर उन्हें बाखूबी निभा रहे हैं. मैंने उनके अनुशासन और उनके फोकस को लेकर भी कई कहानियां सुनी थी. इसलिए भी मैं उनके साथ काम करना चाहती थी. मैंने जितना सोचा था, इस फिल्म को करते हुए उससे कही ज्यादा बेहतर अनुभव हुए फिल्म के दो टे्लर और तीन गाने बाजार में आ चुके हैं, जिनका बहुत अच्छा रिस्पांस मिला है.

आपके अनुसार जॉली एलएलबी 2’ है क्या?

लोग इसे कोर्ट रूम ड्रामा कह रहे हैं. मैं भी मानती हूं कि यह कोर्ट रूम ड्रामा है. पर बहुत अलग तरह का है. इस फिल्म में ऐसा कोर्ट रूम ड्रामा है, जो बहुत अलग है. इससे पहले ‘जॉली एलएलबी’ में कोर्ट रूम ड्रामा एक लैंड मार्क था. मगर हमारी फिल्म की कहानी का जॉली एलएलबी से कोई संबंध नहीं है. उस फिल्म में अलग जॉली था, अलग कहानी थी. इस फिल्म में अलग जॉली है. अलग कहानी है. हम लोग एक विचार को आगे लेकर जा रहे हैं, अब फिल्म में अक्षय कुमार हैं. इसलिए कहानी थोड़ी बड़ी और बेहतरीन हो गयी है. फिर मैं इस फिल्म का हिस्सा हूं. फिल्म में मनोरंजन के साथ साथ संदेश भी है.

फिल्म का संदेश या विचार क्या है?

इस फिल्म में कोर्ट रूम ड्रामा तो कोर्ट रूम के अंदर होता है, पर किसी मुकदमे को लेकर अदालत से बाहर जो ड्रामा चलता है, उसका भी चित्रण है. फिल्म की कहानी में कुछ रहस्य भी है.

आपने जॉली एलएलबी देखी होगी. जॉली एलएलबी 2’ उसी का सिक्वअल है, तो दोनों फिल्मों में क्या फर्क पाती हैं?

बहुत फर्क है. कहानी में अंतर है. यह बड़े बजट की फिल्म है. इसका कैनवास बड़ा है. इसमें कॉमेडी, ड्रामा, ह्यूमर, सब कुछ बहुत अलग स्तर पर है. इसके साथ ही इस बार तो इस फिल्म में मैं हूं.

इसके अलावा क्या कर रही हैं?

मैंने गुरिंदर चड्ढा के निर्देशन में एक अंतरराष्ट्रीय फिल्म ‘वायसराय हाउस’ की है, जिसमें वायसराय हाउस के अंदर कार्यरत एक हिंदू लड़के व एक मुस्लिम लड़की की प्रेम कथा है. मैंने इसमें मुस्लिम लड़की आलिया नूर का किरदार निभाया है, जो कि उर्दू अनुवादक है. यह फिल्म 1947 के देश के बंटवारे से पहले के चार पांच माह की कहानी है.

‘वायसराय हाउस’ तो पीरियड व ऐतिहासिक फिल्म है. इसके लिए आपने कोई शोधकार्य किया था?

जी हां! इतिहास मेरा प्रिय विषय रहा है. मैंने इतिहास में ऑनर्स किया है, जब मैं इस फिल्म का हिस्सा बनी, तो शूटिंग करने से पहले मैंने काफी पढ़ाई की. काफी रिसर्च किया. ‘इंडिया रिमेंम्बर्ड’, ‘चिल्ड्रेन इन द मिड नाइट’ सहित कई किताबें पढ़ी. उस दौर के कुछ लोगों से मिली, बातचीत की. उस दौर में जब एक कैबिनेट मंत्री थी, राजकुमार निर्मित कौर उनकी नीस ही उर्दू अनुवाद थी, जो कि अब 98 साल की हैं, उनसे मिली बहुत कुछ उनसे जानने का मौका मिला. लंदन में गुरिंदर ने ही उनसे मेरी मुलाकात करवायी, मुझे यह जानना था कि उस वक्त यह टीनएजर लड़की कैसी होती है, किस तरह से बात करती है.

इस फिल्म में तमाम विदेशी कलाकारों के साथ आपने काम किया है, क्या अनुभव मिले?

मुझे लगा कि कलाकार कलाकार होता है, फिर चाहे वह भारतीय हो या विदेशी. हां! बहुत अनुशासन प्रिय होते है. मैंने देखा कि उनके अंदर भारत को लेकर जानने की इच्छा है. उनके अंदर भारत को लेकर बहुत उत्सुकता है.

फिल्म वायसराय हाउस को कहां फिल्माया गया है?

जोधपुर और दिल्ली में इसे फिल्माया है. फिल्म देश के बंटवारे की पृष्ठभूमि में भारत की कहानी है. इस फिल्म को करना बहुत कठिन था, फिल्म बहुत निजी भी है. इस फिल्म को करके मैं उत्साहित भी हूं. मुझे गर्व हैं कि मैंने ‘वायसराय हाउस’ जैसी फिल्म की है.

गुरिंदर चड्ढा को लेकर क्या कहेंगी?

गुरिंदर चड्ढा से मिलने के बाद मैंने सीखा कि एक पंजाबन को कही भी ले जाओ, वह हमेशा पंजाबन रहेगी. गुरिंदर चड्ढा के माता पिता भारतीय पंजाबी हैं, पर उनका जन्म ब्रिटेन के साउथ हॉल में हुआ, जहां उनके पिता काम करते थे, तो वह पूरी तरह से ब्रिटिश हैं. पर वह बहुत देशी हैं, भारतीय हैं, दिल से तो वह पंजाबन ही हैं. मैं भी पंजाबन हूं. मैं पंजाबी समझ लेती हूं. पर बोल नहीं पाती. पर पता नहीं क्यों गुरिंदर को लगता था कि मैं पंजाबी बहुत अच्छा बोलती हूं, तो वह मुझे हमेशा पंजाबी में ही बात करती थीं. उनके साथ काम करते हुए मैंने पाया कि गोरों के बीच वह मेरे अंदर अपना घर पाती थी. फिल्म भी खूबसूरत बनी है. आप यह मान लें कि यह फिल्म एक ब्रिटिश पंजाबी भारतीय देश के बंटवारे को किस नजरिए से देखे, उसकी कथा हैं. उन्होंने इस मुद्दे पर बहुत ही बैलेंस्ड नजरिया पेश किया है. किसी एक देश या भावना पर आधारित यह फिल्म नहीं है. उन्होंने किसी को अच्छा बुरा दिखाने की बजाए, जो वास्तव में घटित हुआ था, उसको उसके सही परिप्रेक्ष्य रूप में पेश किया है.

तमाम कलाकार वेब सीरिज कर रहें हैं और आप?

जो वेब सीरिज कर रहे हैं, उन्हें मैं बधाई देती हूं. पर फिलहाल मैं उससे दूर हूं.

आपने गौहर खान के साथ एक लघु फिल्म एक दोपहर की है. क्या कहेंगी?

इस फिल्म की निर्देशक स्वाती, हबीब फैजल की सहायक हैं. एक दिन हबीब फैजल ने मुझे फोन किया कि उनकी सहायक एक फिल्म बना रही हैं, और वह चाहती हैं कि मैं यह फिल्म करूं. जब कोई मुझसे कहता है कि वह फिल्म मैं ही करूं, तो मेरी उत्सुकता बढ़ जाती है कि आखिर इस फिल्म में ऐसा क्या है? इसी उत्सुकता के साथ जब मैं स्वाती से मिली, तो उसमें मुझे जोश नजर आया. कहानी अच्छी लगी. हमने एक दिन में ही पूरी फिल्म की शूटिंग पूरी की.

अब तक आपने जो किरदार निभाए हैं, उनमें से किस किरदार ने आपकी निजी जिंदगी पर प्रभाव डाला है?

किसी किरदार ने मेरी जिंदगी पर असर डाला या नहीं डाला, यह तो नहीं बता सकती. पर ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ मेरे करियर की बहुत खास फिल्म है. इसी फिल्म से मैंने अपनी जिंदगी व करियर में बहुत कुछ पाया है. इस फिल्म से पहले मुझे भी नहीं पता था कि मैं किस तरह का अभिनय कर सकती हूं. मुझे सिर्फ यह पता था कि मुझे अभिनय करना है. पर मेरे अंदर अभिनय की गुणवत्ता को इस फिल्म ने उजागर किया, इस फिल्म ने मुझे अपने अंदर के कलाकार को जानने पहचानने का मौका दिया. वहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति भी दिलायी.

आपके सपने क्या हैं?

कई सपने हैं. एक बायोपिक फिल्म करनी है. एक्शन फिल्में करनी हैं. एक मेंटल लड़की का किरदार निभाना चाहती हूं. क्षेत्रीय फिल्मों में भी काम करना चाहती हूं. मैं अच्छा काम करना चाहती हूं और इंज्वॉय करना चाहती हूं. मेरे सपनों का कोई अंत नहीं है.

आइटम नंबर को लेकर आपकी क्या सोच है?

मेरा मानना है कि यदि फिल्म में आइटम नंबर की जरूरत है, तो आइटम नंबर होने चाहिए. कुछ लोग आरोप लगाते हैं कि आइटम नंबर की वजह से नारियों के साथ हिंसा हो रही है, नारियों के साथ बलात्कार हो रहे हैं, तो यह गलत है.

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