शुभारंभ: क्या रानी की खुशियों के लिए उसके ही ससुराल में चोरी करेगा उत्सव?

कलर्स के शो, ‘शुभारंभ’ में शादी के बाद राजा-रानी की नई जिंदगी का शुभारंभ हो गया है. धीरे-धीरे दोनों के बीच प्यार और नज़दीकियाँ बढ़ रही हैं. वहीं राजा की माँ, आशा ने राजा और रानी को हनीमून पर भेजने का मन बना लिया है, लेकिन क्या कीर्तिदा, आशा की इस चाहत को पूरा होने देगी? आइए आपको बताते हैं क्या होगा शो में आगे…

हनीमून पर स्विट्जरलैंड भेजेगी आशा

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अब तक आपने देखा कि शादी के बाद राजा-रानी की पहली रात आ चुकी है, जिसमें दोनों पहली बार करीब आने वाले होते हैं. दूसरी तरफ कीर्तिदा और गुणवंत ये सुनकर हैरान हो जाते हैं कि आशा ने राजा और रानी के हनीमून के लिए स्विजरलैंड की टिकट बुक कर दी है. वहीं रानी, राजा को बताती है कि उसे हवाई जहाज में बैठने से डर लगता है, तब राजा, रानी का डर मिटाने की एक प्यारी सी कोशिश करता है. 

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पगफेरे के लिए मायके जाएगी रानी

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आने वाले एपिसोड में आप देखेंगे कि, राजा और रानी दोनों पगफेरे के लिए रानी के मायके जाएंगे. वहीं राजा की माँ को पैसे देने का डर रानी के भाई, उत्सव को सताएगा, जिसके लिए उत्सव का दोस्त रानी के ससुराल से पैसे चुराने की सलाह देता है. अपनी माँ से ससुराल की बातें करते वक्त जब रानी उन्हें चाबियाँ दिखाती है, उत्सव के मन में चोरी का ख्याल घर करने लगता है.

अब देखना ये है कि क्या उत्सव अपनी बहन, रानी की खुशियों के लिए उसके ही ससुराल में चोरी करेगा? जानने के लिए देखते रहिए शुभारंभ, सोमवार से शुक्रवार रात 9 बजे, सिर्फ कलर्स पर.

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लेजर ट्रीटमैंट से पाएं बेदाग स्किन

बेदाग चेहरा हर किसी को पसंद होता है. लेकिन यदि खूबसूरत चेहरे पर कोई दाग लग जाए तो वह भद्दा दिखने लगता है. जरूरी नहीं कि यह दाग जलने या कटने का हो. हो सकता है जन्म से हो. चेहरे पर कई प्रकार के मार्क्स हो जाते हैं जैसे तिल, मस्सा, फ्रैकल्स, बर्थमार्क इत्यादि. इन मार्क्स की वजह से चेहरे की खूबसूरती छिन सी जाती है. मगर अब बदलते समय के साथ ईजाद होती नई तकनीकों से इन मार्क्स को आसानी से हटाया जा सकता है.

इन्हीं नई तकनीकों में एक लेजर ट्रीटमैंट है. लेजर ट्रीटमैंट क्या है और यह कितना कारगर है, आइए जानते हैं ऐक्सपर्ट निमीषा गुप्ता से:

क्या है लेजर ट्रीटमैंट?

लेजर ट्रीटमैंट में लाइट की तेज किरणें ट्रीटमैंट किए जाने वाले हिस्से पर डाली जाती हैं, जो स्किन के ऊपर या अंदर वाली लेयर तक जा कर ट्रीटमैंट करती हैं. लेजर ट्रीटमैंट से स्किन के अनचाहे हिस्से को बर्न कर दिया जाता है, जिस से अनचाहा दाग खत्म हो जाता है.

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क्या बर्न करते समय स्किन के बाकी हिस्से को नुकसान पहुंचने का डर रहता है?

बिलकुल नहीं. बर्न सिर्फ  स्किन के उस हिस्से को किया जाता है जहां ट्रीटमैंट करना है. लेजर ट्रीटमैंट करते समय ऐनर्जी भी उतनी ही सैट की जाती है जितनी जरूरत होती है. यदि किसी के चेहरे पर लाइट फ्रैकल्स हैं तो ऐसे में ऐनर्जी लैवल 0.5 रखा जाता है. लेकिन फ्रैकल्स ज्यादा डार्क हों तो ऐनर्जी लैवल 0.5 से 1.5 तक रखा जाता है.

लेजर ट्रीटमैंट कितने प्रकार का होता है?

लेजर ट्रीटमैंट कई प्रकार का होता है, लेकिन ज्यादातर लोग Co2  और फ्रैकल्स लेजर करवाते हैं. इन की मदद से स्किन पर किसी भी प्रकार का निशान या दाग आसानी से ठीक हो जाता है.

Co2  लेजर क्या है और इस की प्रक्रिया क्या है?

Co2  लेजर से मस्सा, तिल या चेहरे पर होने वाला कोई भी निशान आसानी से हटाया जा सकता है. Co2  लेजर 0.5 ऐनर्जी पर किया जाता है. इस से चेहरे पर हुए अनचाहे निशान को जला दिया जाता है.

Co2  लेजर करने से पहले डाक्टर चेहरे के उस हिस्से को सुन्न करते हैं. कुछ देर बाद उस हिस्से को क्लीन कर दिया जाता है. फिर उस सुन्न किए गए हिस्से पर लेजर ट्रीटमैंट किया जाता है. लेजर करते समय हलकी बर्निंग होती है, जिस से चेहरे पर हुआ मार्क  जल जाता है और कुछ ही दिनों में यह सूख जाता है और पपड़ी बन कर रिमूव हो जाता है.

कितना समय लगता है निशान को चेहरे से हटने में?

करीब 5 दिनों के भीतर दाग रिमूव हो जाता है.

Co2  लेजर के बाद किन बातों का ध्यान रखना जरूरी है?

Co2  लेजर के बाद लेजर किए गए हिस्से पर डाक्टर द्वारा दी गई दवा को समय पर लगाना जरूरी है. जब भी चेहरा वाश करना हो तो गरम पानी का इस्तेमाल करना चाहिए. Co2  लेजर होने के कुछ दिनों तक किसी भी प्रकार के कौस्मैटिक का इस्तेमाल करना मना होता है.

फ्रैकल्स लेजर और Co2  लेजर में क्या फर्क है?

Co2  और फ्रैकल्स लेजर लगभग समान हैं. दोनों ही स्किन पर हुए अनचाहे मार्क्स को खत्म करने के लिए किए जाते हैं. फ्रैकल्स लेजर का इस्तेमाल बर्थ मार्क, चेहरे पर खड्डे और स्ट्रैच मार्क्स को कम करने के लिए किया जाता है.

स्ट्रैच मार्क्स व अन्य मार्क्स को रिमूव करने के लिए फ्रैकल्स लेजर कितना समय लेता है?

फ्रैकल्स लेजर में कम से कम 15 दिन लगते हैं. स्ट्रैच मार्क्स को रिमूव करने में थोड़ा ज्यादा समय लगता है. कई बार स्ट्रैच मार्क्स अधिक डार्क होने की वजह से कई सिटिंग्स लेनी पड़ती हैं. इस में कम से कम 7-8 सिटिंग्स की जरूरत पड़ती ही है.

क्या स्ट्रैच मार्क्स पूरी तरह ठीक हो जाते हैं?

स्ट्रैच मार्क्स पूरी तरह खत्म नहीं होते, लेकिन 80% पहले से दिखने में हलके जरूर हो जाते है.

फ्रैकल्स लेजर किस तरह काम करता है?

फ्रैकल्स लेजर स्किन की बाहरी और अंदर की लेयर को बर्न कर देता है, जिस से कुछ दिनों में वह सूख कर पपड़ी बनने लगती है और धीरेधीरे रिमूव होती जाती है. फ्रैकल्स लेजर का इस्तेमाल स्किन पर हुए डार्क निशान के लिए किया जाता है.

क्या लेजर से कोई साइड इफैक्ट भी हो सकता है?

बिलकुल नहीं, लेजर से किसी भी प्रकार का साइड इफैक्ट नहीं होता. बस डाक्टर द्वारा दी गई सलाह को मानना जरूरी है. हां, यह ट्रीटमैंट प्रशिक्षित चिकित्सक से ही कराएं.

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इन बातों का ध्यान रखें:

– लेजर के बाद मेकअप का इस्तेमाल न करें.

– लेजर की गई जगह नाखून न लगे.

– उस जगह को गरम पानी से साफ  करें.

– डाक्टर द्वारा दी गई दवा का रोजाना इस्तेमाल करें.

– चेहरे पर साबुन या फेस वाश का भी इस्तेमाल न करें.

6 लक्षण जो बताएं विटामिन की कमी के बारे में

शरीर अंदरूनी तौर पर मजबूत रहे, इम्यून सिस्टम में इजाफा हो, इसके लिए शरीर में विटामिन्स के सही लैवल का होना बेहद जरूरी है. लेकिन जब हम अपनी डाइट में पौष्टिकता से भरपूर चीज़ें नहीं लेते हैं तो हमारे शरीर में विटामिन्स की कमी हो जाती है, जो हमारे समक्ष ढेरों समस्याएं खड़ी कर देती हैं. जिसे शायद आप शुरुआती स्तर पर न पहचान पाएं, लेकिन जैसेजैसे स्थिति गंभीर होती जाती है, इसके लक्षण स्पष्ट तौर पर दिखने लगते हैं. जानिए क्या है विटामिन्स की कमी के लक्षण.

1. नाखून व बालों का कमजोर पड़ना

विटामिन बी 7 ,जिसे बायोटिन के नाम से भी जानते हैं, जो शरीर में ऊर्जा प्रदान करने का काम करता है. लेकिन इसकी कमी से नाख़ून व बाल कमजोर पड़ने के कारण टूटने लगते हैं. साथ ही जल्दी थकान होना, मांसपेशियों में दर्द , हाथपैरों में झनझनाहट आदि की समस्या भी देखने को मिलती है. ऐसा अक्सर एंटीबीओटिक्स मेडिसिन्स व कच्चे अंडे खाने के कारण भी होता है.

क्या खाएं – आप अंडे के पीले भाग ,मछली ,मीट, नट्स, पालक, साबुत अनाज को अपने खाने में शामिल करें.

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2. मुंह का अल्सर

आमतौर पर विटामिन बी व आयरन की कमी के कारण मुंह का अल्सर हो जाता है. इसके साथ लिप्स व किनारों का फट जाना, ब्लीडिंग का कारण भी विटामिन बी 2 और आयरन की कमी से जुड़ा हुआ है. एक अध्ययन से पता चला है कि मुंह के अल्सर से पीड़ित रोगियों में आयरन की कमी दोगुना ज्यादा होती है.

क्या खाएं – इसकी कमी को पूरा करने के लिए आप मीट, फिश, हरी सब्ज़ियां ,नट्स, दूध, फलियाँ आदि लें.

3. दांतों से खून आना

विटामिन सी की कमी दांतों से खून आने, मांसपेशियों के कमजोर पड़ने व थकान का मुख्य कारण है. क्योकि शरीर में विटामिन सी खुद नहीं बनता बल्कि इसके लिए हमें अपनी डाइट में विटामिन सी की मात्रा को बढ़ाने की जरूरत होती है. आपको बता दें कि विटामिन सी जख्मों को भरने, इम्युनिटी बढ़ाने व इसमें एंटीऑक्सीडेंट्स गुण होने के कारण यह कोशिकाओं को नष्ट होने से बचाते हैं.

क्या खाएं – आप अपने खाने में कीवी, फलों, स्प्राउट्स, मटर, बीन्स, नीम्बू, टमाटर आदि को ज्यादा से ज्यादा शामिल करें.

4. हेयरफौल की समस्या

बाल झड़ने की समस्या का कारण या तो गलत शैम्पू का इस्तेमाल करना होता है या फिर विटामिन्स की कमी. देखने में आया है कि आजकल खानपान में लापरवाही की वजह से 30 की उम्र के बाद से ही बाल झड़ने लग जाते हैं. जिसे रोकने के लिए पौष्टिक डाइट ,जिसमें आयरन, विटामिन बी 3 और विटामिन बी 7 को शामिल करना जरूरी है.

क्या खाएं – अपनी डाइट में हरी पत्तेदार सब्ज़ियां, मीट, नट्स, साबुत अनाज, मछली आदि को शामिल करें.

5. रैस्टलैस लैग सिंड्रोम

रैस्टलैस लैग सिंड्रोम के कारण पैरों में अजीब सी बेचैनी के साथ उसे हिलाने डुलाने में दिक्कत होती है, जिस का सीधा संबंध आयरन की कमी से जुड़ा हुआ है. अकसर प्रैग्नैंसी के समय भी आयरन के स्तर में कमी देखने को मिलती है, जिस की बहुत ज्यादा कमी होने पर आयरन सप्लिमैंट्ïस तक दिए जाते हैं. ऐसी स्थिति उत्पन्न न हो इसलिए पहले से ही हैल्दी डाइट लें.

क्या खाएं –  आप हरी सब्जियां, मीट, मछली, साबुत अनाज, नट्ïस, फल आदि खूब खाएं.

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6. स्किन रैशेस की समस्या

स्किन के लाल व रैशेस पड़ने का खास कारण विटामिन बी 6 की कमी होती है. क्योकि विटामिन synthesize कोलेजन में मदद करता है, जो हैल्दी स्किन के लिए जरूरी है. कुछ लोग seborrheic dermatitis से प्रभावित हो जाते हैं, जिन्हें सबसे ज्यादा विटामिन बी 6 की जरूरत होती है.

क्या खाएं – ब्रेड, फिश, अंडे, ब्राउन राइस, सोयाबीन खूब खाएं.

घर पर बनाएं टेस्टी पनीर भुर्जी

पनीर के व्यंजन बच्चे, बड़े सभी को पसंद आते हैं? तो अगली बार पनीर की ये रेसिपी जरूर ट्राय करें. हमें लिखकर जरूर बतायें कि आपको और आपके घरवालों को ये रेसिपी कैसी लगी.

हमें चाहिए

– 250 ग्राम पनीर

– 1 टेबल स्पून तेल

– 1/4 टी स्पून जीरा

– 2 चुटकी हल्दी पाउडर

– 2 हरी मिर्च

– 1 इंच टुकड़ा अदरक कसा हुआ

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– 1 प्याज बारीक कटी हुई

– 1/2 कप हरी मटर

– 1 शिमला मिर्च बारीक कटी हुई

– 1 टमाटर कटा हुआ

– 1/2 टीस्पून गरम मसाला

– स्वादानुसार नमक

– 1 टेबल स्पून हरी धनिया कटी हुई.

बनाने का तरीका

1. पनीर को हलके हाथों से मसल लें. सारी सब्जियां धोकर काट लें.

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2. एक गहरे पैन में घी गर्म करें और उसमें जीरा डाल कर भून लें. उसके बाद उसमें प्याज, हल्दी पाउडर, कटी हुई हरी मिर्च, अदरक, मटर के दाने, शिमला मिर्च और टमाटर डाल कर अच्छी तरह भूनें.

3. पनीर, नमक व गरम मसाला डालकर अच्छी तरह मिलाएं.

4. हरी धनिया से सजाकर गरमागरम परांठे, चपाती या नान के साथ सर्व करें.

अनुशासन का पाठ पढ़ाने के लिए बच्चों को सजा देना जरूरी नहीं है

अंगे्रजी में एक कहावत है-‘स्पेयर द राॅड एण्ड स्पाॅइल द चाइल्ड’ मतलब यह कि अगर बच्चे को डांटकर या पिटाई करके अनुशासित करने की कोशिश की तो वह उल्टे और बिगड़ जायेगा. भले आज भी हमें कई ऐसे महानुभाव मिल जाते हों, जो यह राग अलापते न थकते हों कि पिटाई के बिना बच्चे काबू में नहीं आते. लेकिन सच्चाई यह है कि दुनिया के ज्यादातर देशांे में बच्चों पर न केवल पैरेंट्स बल्कि टीचर का हाथ उठाना भी गैरकानूनी है. दरअसल बच्चों के प्रति हिंसा के विरूद्ध इस तरह के कानून इसलिए बने हैं क्योंकि दुनिया के बड़े बड़े समाजशास्त्री और मनोविद यह मानते हैं कि हिंसा से बच्चों में सुधार नहीं लाया जा सकता.

समाजशास्त्रियों और मनोविदों ने बच्चों के बाल मन का गहराई से अध्ययन किया है और यह पाया है कि इसमें कोई दो राय नहीं कि छोटे बच्चों को अनुशासित करना काफी कठिन होता है, लेकिन इसके लिए मासूमों की पिटाई करना या उन्हें पिटाई का भय दिखाना, कतई सही नहीं है. हर घर या स्कूल में कुछ ऐसे शरारती बच्चे होते ही हैं, जो परेशानी का कारण न भी हों तो भी अकसर परेशानी में पड़ जाते हैं. पुराने समय में ऐसे बच्चों को अनुशासित करने का एक ही तरीका होता था, उन्हें डांटना, शारीरिक या मानसिक सजा देना. यहां तक कि स्कूल में अध्यापक उन्हें क्लास तक से निकाल देते थे.

मगर सवाल है इतने कड़े अनुशासनों से क्या वाकई बच्चे कुछ सीखते हैं? क्या उनका आक्रामक रूख शांत होता है? अगर सचमुच ऐसा होता तो एक समय के बाद बच्चों में इस तरह की समस्याएं ही न रहतीं. ऐसी समस्याएं हमेशा के लिए खत्म हो गई होतीं. मगर हम सब जानते हैं कि ऐसा नहीं हुआ. जाहिर है बच्चे मारपीट से अनुशासित नहीं होते. मनोवैज्ञानिकों ने बच्चों के मनोविज्ञान पर लंबे समय तक नजर रखने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि उन्हें अनुशासित रखने मंे शारीरिक या मनोवैज्ञानिक सजा का कोई असर नहीं होता. मनोवैज्ञानिकों ने इस संबंध में एक महत्वपूर्ण बात यह खोजी है कि अगर बच्चों को लगातार सुध्ाारने व सजा देने का सिलसिला जारी रखा जाए तो वे सजा पाने के आदी हो जाएंगे और फिर इसका उन पर कोई असर नहीं पड़ेगा. दूसरे शब्दांे में सजाएं देना इच्छित नतीजे बरामद करने का जरिया नहीं हैं.

यह समस्या तब और जटिल हो जाती है, जब बात ऐसे बच्चों की हो जो समाजिक, भावनात्मक व व्यवहारिक चुनौतियों से पीड़ित होते हैं. वास्तव में बच्चों को नियमित सजा देने से दीर्घकालीन लक्ष्य नष्ट हो जाते हैं. क्योंकि बच्चों के मामले में दीर्घकालीन लक्ष्य का उद्देश्य उनमें अच्छा व्यवहार उत्पन्न करना होता है, जिससे कि वे बेहतर नागरिक बन सकंे. जबकि सजा से सिर्फ अल्पकालीन लाभ ही होता है कि थोड़े समय के लिए घर या कक्षा मंे शांति स्थापित हो जाती है.

हालांकि पैरंेट्स, टीचर्स व प्रशासक पूरी दुनिया में आज भी ईनाम व सजा व्यवस्था पर बहुत अधिक भरोसा करते हैं, जिसका संबंध 20वीं शताब्दी के प्रारम्भ से है. दूसरे शब्दांे में बच्चों को या तो कुछ लालच देकर या उसे सजा देकर अनुशासित करने का प्रयास किया जाता है. जबकि बाल मनोविदो के मुताबिक बच्चों को सजा देने के बजाय उस समस्या के निदान के बारे में सोचना चाहिए, जो उनके अनुशासन को बनाये रखने में बाधक हों. ऐसा करने से बच्चे आसानी से अनुशासन के दायरे में अपने को ले आते हैं. हार्वर्ड व वर्जीनिया टेक में अध्यापन कार्य कर चुके मनोवैज्ञानिक राॅस ग्रीन ने अपनी पुस्तक ‘द एक्सप्लोसिव चाइल्ड एण्ड लोस्ट एट स्कूल’ के जरिए शिक्षकों व पैरेंट्स में अपनी गहरी छाप छोड़ी है, खासकर उनमें जो चुनौतीपूर्ण बच्चों का सामना करते हैं.

राॅस ग्रीन की यह पुस्तक इस संदर्भ मंे अंतिम शब्द समझी जाती है और इसमें विस्तार से वह माॅडल समझाया गया है, जिससे बिना सजा दिए बच्चे की परवरिश इस तरह की जा सकती है कि वह स्वयं अपने व्यवहार पर नियंत्रण करना सीख जाए. राॅस ग्रीन ने यह माॅडल बाल मनोवैज्ञानिक क्लीनिकों में विकसित किया है और इसका सफल परीक्षण बालगृहों में किया गया है. इस पद्धति से बच्चों की आपसी आक्रामकता में 80 प्रतिशत तक की कमी देखने को मिली है. राॅस ग्रीन का सुझाव यह है कि बच्चे से बात की जाए कि उसके गुस्से या हिंसक व्यवहार के पीछे असली समस्या क्या हैं? कारण जानकर उसे शांत करने के लिए वैकल्पिक योजनाएं तैयार की जाएं. कुल मिलाकर कहने की बात यह है कि लक्ष्य बच्चे की समस्या की जड़ तक पहुंचना होना चाहिए. ‘कोलाॅबरेटिव एण्ड प्रोएक्टिव सोल्यूशंस’ नामक ग्रीन का यह कार्यक्रम उन न्यूरो वैज्ञानिकों के गहन शोध पर आधारित है, जिन्होंने खोजा था कि हमारे मस्तिष्क का आगे का हिस्सा यानी प्रीफ्रंटल कोरटेक्स आवेग नियंत्रित करने की हमारी क्षमता का प्रबंधन करता है, कामों को वरीयता प्रदान करता है और योजनाओं को संगठित करता है. वैज्ञानिकों के मुताबिक आक्रामक बच्चों के मस्तिष्क का यह क्षेत्र विकसित नहीं होता या बहुत धीरे धीरे विकास करता है.

इसलिए बच्चे के पास मानसिक क्षमता नहीं होती कि वह अपने व्यवहार पर नियंत्रण रख सके. राॅस ग्रीन पैरेंट्स को सुझाव देते हैं कि वे बजाय उन्हें पीटने के या डांटने के उनकी समस्या समाध्ाान योग्यता को विकसित करने पर फोकस करें. यह तरीका बच्चों के आक्रामक व्यवहार को शांत करने में काफी मददगार रहा है. अपने अध्ययन में ग्रीन ने यह भी पाया है कि अधिकतर शिक्षक बच्चे की समस्या को स्कूल के बाहर की यानी बच्चों के घर की देन समझते हैं, इसलिए वे उनकी इस समस्या के निदान के प्रति उदासीन रहते हैं. जबकि यह समस्या घर की नहीं बल्कि बच्चों की मानसिक क्षमता की होती है.

इसलिए ग्रीन के अनुसार शिक्षकों को इस बात पर फोकस करना चाहिए कि स्कूल का वातावरण बच्चे के व्यवहार में सकारात्मक अंतर लाए. उनके मुताबिक घर पर बच्चे की स्थिति चाहे जो भी हो स्कूल मंे रोजाना 6 घंटे के दौरान, सप्ताह में पांच दिन, साल में 9 महीने में उसमें बहुत सा सुधार लाया जा सकता है, बशर्ते हम बच्चों की आक्रामकता की तह में जाकर उसे रचनात्मक तरीके से खत्म करने की कोशिश करें.

जानिए आखिर कब कब रोते हैं बच्चे

श्वेता पहली बार मां बन कर काफी खुश थी. बच्चे के स्पर्श से उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसे दुनिया भर की खुशियां मिल गई हों. लेकिन कुछ ही दिनों बाद वह परेशान रहने लगी. वह समझ ही नहीं पा रही थी कि उस का कृष इतना रोता क्यों है.

दरअसल, छोटे बच्चे के रोने में एक मैसेज छिपा होता है. वह रो कर अपनी मां को कम्युनिकेट करता है कि उसे भूख लगी है. न्यूट्री किड चाइल्ड ऐंड ऐडौलेसेंट क्लीनिक की डा. रिती शर्मा दयाल बताती हैं, ‘‘छोटे बच्चे बहुत ही नाजुक होते हैं. उन पर मौसम का जल्द असर होता है. उन्हें बहुत जल्दी ठंड तो बहुत जल्दी गरमी लगने लगती है. इसी वजह से वे रोते हैं. अधिकांश समय बच्चे भूख लगने की वजह से भी रोते हैं. इसलिए उन्हें थोड़ेथोड़े समय के अंतराल में दूध पिलाती रहें वरना उन्हें कौलिक की समस्या होने लगती है यानी पेट में गैस बनने लगती है, जिस की वजह से बच्चे रोते हैं.’’

रोने के कारण

भूख लगने पर: भूख लगने के कारण न्यू बौर्न बेबी सब से ज्यादा रोते हैं. उन का पेट छोटा होता है इसी वजह से उन्हें एक बार में दूध नहीं पिलाया जा सकता. उन्हें थोड़ेथोड़े अंतराल में दूध पिलाने की जरूरत पड़ती है. इसलिए जब भी बच्चा रोए तो उसे दूध पिलाएं. अगर बच्चा स्तनपान करता है तो उसे दिन में 8-12 बार स्तनपान कराएं.

गीले व गंदे डायपर की वजह से: गीलापन भला किसे अच्छा लगता है. छोटे बच्चे गीली नैपी में असहज महसूस करते हैं. ज्यादा देर तक बच्चों को गीली नैपी में रखने से रैशेज हो जाते हैं, जिस की वजह से बच्चे बहुत रोते हैं. जब भी बच्चों को नैपी पहनाएं तो समयसमय पर चैक करती रहें कि नैपी गीली तो नहीं है और गीली होने पर तुरंत बदल दें.

गोद में आने के लिए: नवजात शिशु को मां का शारीरिक स्पर्श अच्छा लगता है. वह हमेशा मां के सीने से चिपका रहना चाहता है. कभीकभी वह गोद में आने के लिए रोता भी. गोद में लेने पर उसे अपनेपन का एहसास होता है.

बहुत गरमी या ठंड लगने पर: बच्चों की स्किन बहुत संवेदनशील होती है. कमरे का तापमान ठंडा होने पर उन्हें बहुत जल्दी ठंड लगने लगती है तो तापमान ज्यादा होने पर गरमी भी जल्दी लगती है. गरमी लगने पर उन की बौडी में छोटेछोटे दाने निकलने लगते हैं. इसलिए कोशिश करें कि कमरे का तापमान सामान्य रहे.

गैस बनने पर: 3 सप्ताह से ले कर 3 महीने तक के बच्चों में कौलिक की समस्या सब से ज्यादा रहती है यानी पेट में गैस बनती है जिस की वजह से बच्चे रोते हैं. कभीकभी किसी तरह की ऐलर्जी और कीड़ेमकोड़े के काटने की वजह से भी बच्चे रोते हैं.

नींद पूरी नहीं होने पर: बच्चों की नींद पूरी नहीं होने पर भी वे चिड़चिड़े स्वभाव के हो जाते हैं और रोने लगते हैं. इसलिए उन्हें शांत माहौल में सुलाने की कोशिश करें.

थकान होने पर: कई बार बच्चे थके होते हैं, जिस की वजह से उन्हें नींद नहीं आती है और वे रोते रहते हैं.

 बीमार होने पर: अगर आप का बच्चा बहुत ज्यादा रोने लगता है और अचानक चुप हो जाता है तो इस का मतलब यह है कि वह स्वस्थ नहीं है. आप के बच्चे को आप से बेहतर कौन समझ सकता है. इसलिए अगर आप को हलका सा भी लग रहा है कि आप का बच्चा स्वस्थ नहीं है तो उसे तुरंत डाक्टर के पास ले जाएं.

ध्यान आकर्षित करने के लिए: कभीकभी बच्चा मां का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए भी रोता है. इसलिए जब भी बच्चा रोए तो उसे गोद में ले कर प्यार से सहलाएं. उसे एहसास दिलाएं कि आप उस के पास हैं.

नवजात शिशु : कुछ रोचक तथ्य

गगर्भस्थ शिशु और उस के जन्म के तुरंत बाद की उस की स्थिति के बारे में वैज्ञानिक जानकारी हासिल करने का कुतूहल सभी लोगों में होता है. आइए जानिए, इस के बारे में कुछ रोचक तथ्य:

गर्भ में शरीर रचना

गर्भस्थ शिशु की 20वें सप्ताह तक लंबाई 10 सैंटीमीटर, 30वें सप्ताह तक 25 सैंटीमीटर व पूरे कार्यकाल में 53 सैंटीमीटर होती है.

गर्भस्थ शिशु का भार 12 सप्ताह तक कुछ नहीं या केवल मांसनुमा. 23वें सप्ताह तक 1 पौंड. उस के बाद गर्भकाल के अंतिम 3 माह में तेज गति से बढ़ता है तथा 3 पौंड तक हो जाता है. जन्म के 1 माह पूर्व 4.5 पौंड तथा जन्म के समय सामान्य वजन 7 पौंड माना गया है.

शिशु का दिल गर्भकाल के चौथे सप्ताह से धड़कना शुरू हो जाता है तथा इस के धड़कने की गति 65 प्रति मिनट होती है. जन्म से कुछ समय पूर्व इस की गति 140 प्रति मिनट तक पहुंच जाती है.

मस्तिष्क का निचला हिस्सा यानी मेरुरज्जा गर्भकाल के तीसरेचौथे सप्ताह में विकसित हो जाता है. मस्तिष्क का उच्चतम केंद्र यानी सेरेब्रल कार्टेक्स जन्म के समय भी पूर्ण विकसित नहीं  होता है.

शिशु के गुरदे गर्भकाल के चौथे से छठे माह तक अपना कार्य शुरू कर देते हैं.

शिशु में लौह तत्त्व का अद्भुत संग्रहण होता है तथा यह रक्त के हीमोग्लोबिन में समाहित रहता है.

जन्म के बाद

फेफड़ों यानी श्वसन क्रिया की कार्यप्रणाली जन्म के समय शतप्रतिशत शुरू नहीं होती. वह धीरेधीरे पूर्णता की ओर बढ़ती है.

नवजात शिशु की पाचनक्रिया जन्म से ही शुरू हो जाती है. आंतों की प्रक्रिया दिन में 3-4 बार रंग लाती है. शुरू में मल का रंग गहरा हरा होता है जिसे ‘मेकोनियम’ कहते हैं. 3-4 दिन के बाद ही इस का रंग सामान्य हो जाता है.

गुरदे भी अपना काम करना शुरू कर देते हैं. जन्म के 24 घंटे तक पेशाब की मात्रा कम रहती है, मगर 1 सप्ताह होते ही नियमित पेशाब निकलना शुरू हो जाता है, जो हलका पीला होता है.

जन्म के समय रक्त में रक्तकोशिकाओं की संख्या अधिकतम होती है, मगर जन्म के बाद औक्सीजन की कमी दूर हो जाने से यह संख्या अपनेआप सामान्य हो जाती है.

जन्म के समय त्वचा, इस की ग्रंथियों (सेबेसियस ग्लैंड्स) द्वारा सुरक्षित रहती है, जो पीठ पर अधिक मात्रा में रहती है. पहले स्नान के बाद यह कवच उतर जाता है, जिस से त्वचा का रंग गुलाबी नजर आने लगता है और बाद में यह लालिमा लिए होता है.

जन्म के बाद कुछ दिनों तक गुरदों, फेफड़ों, त्वचा, आंतों द्वारा जल निष्कासन के कारण शिशु के शारीरिक वजन में गिरावट आती है, मगर 7.10 औंस से अधिक वजन नहीं गिरना चाहिए. इस के बाद वजन सामान्य रूप से बढ़ने लगता है.

सांसों की शुरुआत

आमतौर पर जन्म से पहले  फेफड़ों की श्वसन इकाइयां ‘एल्वियोलाई’ आपस में सख्ती से गुंथी रहती हैं, जिस से श्वसन क्रिया शुरू नहीं हो पाती. इन्हें अलगअलग करने के लिए, जिस से श्वसन क्रिया आरंभ हो सके, 25 मि.मी. पारे का नेगेटिव दबाव आवश्यक होता है. जब शिशु मां के गर्भ से, जहां का वातावरण बाहरी दुनिया की अपेक्षा गरम होता है, संसार में कदम रखता है, उसे ठंडक तथा औक्सीजन की कमी महसूस होती है, जिस से शरीर में कंपन, चीख तथा संकुचन (प्रथम वायु को अंदर खींचने की प्रक्रिया इंसपिरेशन) जैसी स्थितियां उत्पन्न होती हैं. इस से कुल दबाव 60 मि.मी. पारे नेगेटिव की उत्पत्ति होती है, जो ऊपर वर्णित 25 मि.मी. पारे से दोगुने से भी ज्यादा है, जो बंद श्वसन इकाइयों को खोलने में पर्याप्त से भी ज्यादा है. अत: ये इकाइयां खुल जाती हैं और श्वसन क्रिया शुरू हो जाती है. इसलिए श्वसन क्रिया की शुरुआत के लिए शिशु का रोना या चीखना अनिवार्य होता है. जो शिशु ऐसा नहीं कर पाते, उन्हें ऐसा करने पर विवश किया जाता है ताकि श्वसन आरंभ हो सके.

नवजात शिशु की समस्याएं

वसा का अवशोषण आंतों द्वारा कमजोर होता है, इसलिए शिशु को कैल्सियम तथा विटामिन डी की अधिक जरूरत रहती है. विटामिन सी की भी अतिरिक्त आवश्यकता रहती है.

प्रसव के बाद शिशु की रोगों से लड़ने की प्राकृतिक क्षमता कम हो जाती है, फिर भी 6 माह तक यह क्षमता बनी रहती है. इसी कारण 6 माह बाद टीकाकरण का दौर शुरू होता है.

जन्म के पहले दिन शिशु का रक्तचाप 70/50 मि.मी. होता है, उस के बाद धीरेधीरे यह 90/60 के स्तर पर आता है. यहां से यह वयस्क स्तर 120/80 पर आ कर ठहरता है.

जन्म के समय श्वास की गति 40 प्रति मिनट होती है, जो सामान्य दर से अधिक होती है. यह धीरेधीरे अपने सामान्य स्तर पर आती है.

यदि शिशु की मां को मधुमेह रोग है, तो शिशु की पैंक्रियाज ग्रंथि भी इंसुलिन का अधिक उत्पादन करेगी. इस से शिशु में भी रक्तशर्करा स्तर सामान्य से नीचे गिर जाता है और उस का शारीरिक विकास रुक जाता है.

जन्म के बाद कुछ दिनों तक शिशु का लिवर अल्पविकसित होता है, जिस से रक्त में प्रोटीन का कम मात्रा में उत्पादन होता है. नतीजा, शरीर में जगहजगह सूजन आ सकती है.

नवजात शिशु के गुरदे भी शुरू में कम ही कार्य करते हैं यानी अल्पविकसित होते हैं, जिस से ऐसिडोसिस, निर्जलीकरण जैसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं.

शिशु को शुरू में कुछ ऐलर्जी भी हो सकती है.

अल्पविकसित शिशु की समस्याएं

यदि किसी शिशु का जन्म तय समय से पहले हो जाता है, तो अल्पविकसित शिशु अपने साथ कई समस्याएं ले कर आता है:

यकृत आमतौर 1 माह तक अल्पविकसित रहता है. ऐसे में उसे पीलिया रोग हो जाता है, जिसे ठीक करने के लिए उसे इनक्यूवेटर्स में रखा जाता है.

अल्पविकसित यकृत के कारण रक्त का थक्का बनने में विलंब होता है, जिस से रक्तस्राव की संभावना बनी रहती है.

यकृत के अल्पविकसित होने के कारण रक्त प्रोटीन की मात्रा कम बनती है, जिस से शिशु के शरीर पर सूजन आ सकती है.

रक्त में शक्कर का नवनिर्माण नहीं हो पाता जिस से रक्त ग्लूकोज का स्तर सामान्य से ज्यादा नीचे हो सकता है.

शरीर का तापमान भी सामान्य से नीचे जा सकता है. इसलिए शरीर का तापमान संयत रखने के लिए भी इनक्यूवेटर्स का इस्तेमाल किया जाता है.

गुरदे भी कम विकसित होने से शरीर में अम्ल भस्म का संतुलन नहीं बन पाता, जिस से अति अम्लीय या अति क्षारीय स्थिति का जन्म होता है.

ऐसे शिशु में चरबी का पूर्ण अवशोषण नहीं हो पाता है, इसलिए ऐसे शिशु को चरबी या वसायुक्त भोजन कम देना चाहिए.

जाह्नवी कपूर ने कराया ब्राइडल फोटोशूट, वायरल हुईं फोटोज

फिल्म धड़क से अपने करियर की दमदार शुरुआत करने वाली बौलीवुड की एक्ट्रेस जाह्नवी कपूर अपनी एक्टिंग से ज्यादा  अपने फैशन सैंस को लेकर भी काफी फेमस रहती है. अक्सर अपने ड्रेसिंग सेंस से अपब फैंस का दिल जीत लेती है.-उनके एक से बढ़ कर एक फोटो सोशल मीडिया पर वायरल होते रहते है. इस समय सोशल मीडिया पर जाह्नवी कपूर का एक ब्राइडल लुक काफी वायरल हो रहा है. इस ब्राइडल लुक में जाह्नवी कपूर बहुत ज्यादा खूबसूरत लग रही हैं.

आपको बता दें कि जाहन्वी कपूर ने एक मैगनीज के लिए ब्राइडल फोटो शूट करवाया है. इसमें जाह्नवी कपूर ने लंहगा चोली पहनी हुई है. एक फोटो में उन्होंने ब्लू कलर की डीम नेक आउटफिट कैरी किया है. इसज्व साथ जाह्नवी ने मिनिमल मेकअप, ग्लॉसी लुक के साथ किया है. दूसरी फोटो में जाह्नवी ने हैवी एम्ब्राइडरी वाली ड्रेस पहनी हुई है. जिसमें वह बहुत ही खूबसूरत लग रही है. इसमें वह बहुत ही बोल्ड और खूबसूरत लुक में नजर आ रही है.

 

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हाल ही फेमस मैगजीन के कवर पेज के लिए फोटो शूट करवाया है. इसमें वह हॉट और स्टनिंग दिख रही हैं.  इस मैगजीन के कवर पेज पर जाह्नवी का काफी बोल्ड लुक सामने आएगा. मैगजीन से अपने सोशल एकाउंट से जाह्नवी की एक फोटो शेयर की है. जिसमें वह ग्रे कलर की जैकेट के साथ ऑफ शोल्ड ड्रेस पहने हुए नजर आ रही हैं.

वहीं एक इसी के साथ जाह्नवी की दूसरी फोटो और वीडिया भी सामने आया है जिसमें वह यलो शॉर्टड्रेस में नजर आ रही हैं. सामने आई फोटो में जान्वही का हेयरस्टाइल भी काफी चेंज लग रहा है. जाह्नवी अपने लुक में एकदम फिट नजर आ रही हैं.

 

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एक इंटरव्यू के दौरान जाह्नवी कहती हैं कि आने वाली फिल्मों को लेकर वह बहुत उत्साहित हैं. उन्होंने कहा, “यह फिल्म ऐसी पृष्ठभूमि में बुनी गई है जो मुझे बचपन से ही आकर्षित करती थी. मुझे पाकीजा, उमराव जान, मुगल-ए-आजम जैसी फिल्मों हमेशा काफी पसंद रही हैं. मुझे मुगल इतिहास बहुत पस‍ंद है. इस फिल्म का हिस्सा बनना एक सपने जैसा है.”

 

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जाह्नवी के वर्कफ्रंट की बात करें तो वह इस साल करण जौहर की फिल्म “तख्त” भी शुरू करेंगी. फिल्म में रणवीर सिंह, विक्की कौशल, करीना कपूर खान, अनिल कपूर, आलिया भट्ट, विक्की कौशल और भूमि पेडनेकर भी हैं. हाल ही में वो 1 जनवरी को रिलीज हुई वेब सीरीज में दिखाई दी है. इसके साथ ही वह कार्तिक आर्यन और लक्ष्य के साथ दोस्ताना 2 की शूटिंग में व्यस्त है और जल्द ही गुंजन सक्सेनाः द कारगिल गर्ल फिल्म और रुही-आफजा जैसी कई फिल्मों में नजर आएंगी.

चार महीने पहले ही मम्मी-पापा बने हैं आमिर-संजीदा, सामने आया ये सच

टीवी के स्टार कपल में से एक आमिर अली और संजीदा शेख के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है. हाल ही में खबर थी कि दोनों के बीच तनाव होने के कारण तलाक की नौबत आ गई है. लेकिन इसी बीच खबर है कि दोनों की चार महीने की बेटी है. आइए आपको बताते हैं क्या है आमिर-संजीदा की बेटी से जुड़ा सच…

सेरोगेसी से हुई है बेटी

दरअसल, आमिर अली और संजीदा शेख के एक करीबी दोस्त ने दोनों के अलग होने की बात बताते हुए कहा- हां, कपल की 3-4 महीने की एक बेटी है, जो कि सेरोगेसी से हुई है. वहीं रिपोर्ट्स की मानें तो संजीदा शेख अपनी 4 महीने की बेटी के साथ पैरेंट्स के पास चली गई हैं और वहीं रह रही हैं.

 

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आमिर ने अलग होने को लेकर कही ये बात

 

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आमिर ने एक इंटरव्यू में कहा कि मीडिया में आने वाली सभी खबरें बेबुनियाद हैं और मैं अपनी पत्नी संजीदा शेख से अलग नहीं हो रहा हूं. हम दोनों के बीच सभी चीजें ठीक हैं.

स्टार कपल्स की लिस्ट में शामिल हो चुके हैं आमिर-संजीदा 

टीवी एक्ट्रेस संजीदा शेख और एक्टर आमिर अली स्टार कपल्स की लिस्ट में शुमार किए जाते हैं और दोनों की बौन्डिंग हमेशा ही लोगों को बेहद अच्छी लगी है. लेकिन इस बार दोनों के अलग होने की खबरें मीडिया में छाई हुई हैं.

तलाक होने की कगार पर है आमिर-संजीदा का रिश्ता

 

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मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो दोनों की शादीशुदा जिंदगी में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है. दोनों के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है और बात तलाक तक आ पहुंची है. दलअसल, खबर है कि दोनों एक दूसरे से अलग रहने लगे हैं और अपनी शादी में खुश नहीं है.

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बता दें,  आमिर अली और संजीदा शेख ने 8 साल पहले 2 मार्च 2012 में शादी की थी, जिसके बाद दोनों कई सीरियल्स में नजर आए. इसी के साथ दोनों पौपुलर रियलिटी शो नच बलिए में जोड़ी के रूप में नजर आए थे, जिसे फैंस ने काफी पसंद किया था.

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