मैट्रो की मजेदार दुनिया

लेखक- बाल कृष्ण सक्सेना

मोबाइल फोन में व्यस्त लोगों की भीड़ और उन की निरंतर बातचीत मैट्रो का माहौल बयान करती है. कभी बाएं से तो कभी दाएं से. अकसर बहुत दिलचस्प वार्तालाप सुनने को मिलते हैं. कुछ तो इतनी तेज आवाज में बात करते हैं मानो कि सब को सुनाना चाहते हों या फिर अपनी शेखी बघार रहे हों. दूसरी ओर कुछ महिलाएं तो इतना इतराती हैं कि सुनने वाले सहयात्री भी अटपटा सा महसूस करते हैं.

लेकिन युवा लड़कियां तो दिखावे की होड़ में सब से आगे निकल चुकी हैं. अपने बौयफ्रैंड से फिल्मी अंदाज में आत्मीयता से बात करते हुए यह जानते हुए भी कि सहयात्री सुन रहे हैं, उन्हें रत्तीभर भी झिझक नहीं होती. वजह चाहे जो भी हो, इस प्रकार के लोग तो सहयात्रियों के लिए सिरदर्द होते ही हैं, लेकिन कुछ लोग अनजाने में ही सहयात्रियों को अच्छाखासा मनोरंजन भी कर जाते हैं.

बातचीत कैसी भी हो, आपसी रिश्तों, पारिवारिक तनातनी या फिर प्यारमोहब्बत की, दूसरों की बातें बहुत चटपटी लगती हैं और सुनने में बहुत स्वाद आता है. मैं भी सफर के दौरान मैट्रो की इस मनोरंजन सेवा का आनंद लेता हूं कुछ यों:

डैडीजी की सेवा

मैट्रो में 2 मित्र यात्रा कर रहे थे कि अगले स्टेशन पर एक व्यक्ति ने ट्रेन में प्रवेश किया. शायद वह व्यक्ति उन दोनों का जिगरी मित्र था. हाथ मिला कर प्रेमपूर्वक गले मिला और फिर शिकायत की.

‘‘ओए यार, इतने दिनों से कहां था तू? फोन भी नहीं उठाया, हमें तेरी फिक्र होने लगी थी.’’

‘‘क्या बताऊं यारों, मेरे डैडीजी को हार्टअटैक हुआ था, बस इसी चक्कर में बिजी रहा. आज 7 दिनों बाद दुकान जा रहा हूं.’’

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‘‘अरे यह कब हुआ, तू ने हमें क्यों नहीं बताया? अच्छा डैडीजी अब कहां हैं, कैसे हैं?’’

‘‘पिछले शुक्रवार रात करीब 9 बजे अचानक सीने में दर्द उठा, फिर एकदम बेहोश हो गए, शुक्र है कि मैं घर पर ही था, एकदम नई वाली हौंडा सिटी में अस्पताल ले गया. टाइम से पहुंच गए तो जान बच गई.’’

‘‘क्या पता चला, क्या रिपोर्ट आई?’’

‘‘कई टैस्ट हुए, ऐंजियोग्राफी हुई, 3 जगह ब्लौकेज निकला, सब से महंगे वाले इम्पोर्टेड स्टंट पड़वाए हैं मैं ने. पैसे की तो बिलकुल भी परवाह नहीं की. हर समय डैडीजी की सेवा में लगा रहा.’’

‘‘अब कैसे हैं, कहां पर हैं?’’

‘‘घर पर ही हैं, पूरा आराम कर रहे हैं, दवा चल रही है.’’

‘‘डाक्टर ने खानेपीने का परहेज भी बताया होगा?’’ मित्र ने प्रश्न किया.

‘‘हां, डाक्टर ने तो बहुत कुछ बंद कर दिया है, सीख कबाब, लाल मीट, तली मच्छी सब बंद कर दिया. लेकिन मैं ने डाक्टर से रिक्वैस्ट कर

के कम घीमसाले वाले चिकन की इजाजत तो ले ही ली?’’

‘‘यह तो तू ने बहुत अच्छा किया.’’

एक ने कहा, ‘‘वाह जी वाह… डैडी के लिए इतना सेवाभाव, मान गए यार.’’

दूसरा बोला ‘‘आजकल के बेटे तो बस अपने खानेपीने पर ही पैसा उड़ाते हैं, मातापिता पर कोई खर्च नहीं करता. तेरे सेवाभाव की दाद देते हैं यार,’’ कह कर दोनों दोस्तों ने पित्रभक्त मित्र को गले लगाया और जोरों से उस की पीठ थपथपाई.

सब सहयात्री उन की बातें सुन रहे थे. पित्रभक्त मित्र अपनेआप को बहुत गौरवान्वित महसूस कर रहे थे. हाथ जोड़ कर, नजरें उठा कर ट्रेन की छत की ओर देखते हुए बोले, ‘‘मैं ने तो कुछ नहीं किया, बस डैडी के लिए अपना फर्ज निभाया है.’’

जुगाड़ू गृहिणी

आधुनिकता के मेकअप में लिपटी एक महिला मैट्रो में मेरे बराबर की खाली सीट पर बड़े बेढंगे तरीके से धप्प से आ बैठी. उस के मोबाइल की घंटी बजी तो बातचीत शुरू हुई. जो कुछ भी मैं ने और अन्य सहयात्रियों ने सुना, इस प्रकार था:

‘‘हैलो, पैरी पैना मम्मीजी, सब ठीक है, आप कैसी हैं जी? मैं, मैं तो फीस जमा कराने बच्चों के स्कूल जा रही हूं.’’

‘‘अच्छा जी आप हमारे घर आ रही हैं? हां जी हां, जरूर आइए, आप ही का घर है, आप को पूछने की क्या जरूरत है जी?

‘‘मगर क्या बताऊं, मम्मीजी यहां पानी की बड़ी किल्लत है. 3 दिनों से पानी की एक बूंद नहीं आई, बस गली के बाहर टैंकर आता है, हमारी गली में तो आ नहीं सकता. लंबी लाइनें, धक्कामुक्की कर के बाल्टियां भरभर कर लाते हैं, किसी तरह गुजारा कर रहे हैं. बहुत ही बुरा हाल है.

‘‘अरे नहीं मम्मीजी, आप तो आ ही जाइए, किसी भी तरह से आप के लिए पानी का इंतजाम तो कर ही लेंगे.

‘‘कहना तो नहीं चाहती मम्मीजी, लेकिन एक समस्या और भी है. यहां तो बिजली भी घंटों तक गायब रहती है, नींद पूरी नहीं हो पाती. क्या करें समझ नहीं आता. लेकिन आप तो आइए, यहां सब को बहुत अच्छा लगेगा. बच्चे तो रोज कहते हैं दादी को बुलाओ दादी को बुलाओ.

‘‘क्या कहा? इरादा बदल दिया? अब आप नहीं आ रहीं हैं? मुझे तो बहुत बुरा लग रहा है. चलिए जी, जैसी आप की मरजी. ठीक है, तो फिर यही रहा, जरा गरमी कम हो जाए, 2-3 महीने बाद आप जरूर आइए. अच्छा जी, नमस्ते, पैरी पैना जी.’’

फोन कटते ही महिला ने फौरन किसी को फोन मिला कर बात की, ‘‘हां शीनू, कैसी हो? हमारा प्लान कामयाब रहा, मैं ने बड़ी होशियारी से सासूजी का पत्ता काट दिया.

‘‘हा… हा… हा… हा, तू मुझे क्या समझती है, उड़ती चिडि़या के पर पहचानती हूं. मैं तो कल इन की बातों से ही भांप गई थी कि सासूमां को आने का न्योता दे दिया है, सो मैं ने भी तुरंत चाल चल दी.

‘‘यार इन की चिंता तू न कर, इन को तो मैं अपनी अंटी में रखती हूं, घर की मालकिन हूं मैं, समझी. माना कि मैं कामकाजी महिला नहीं हूं तो क्या हुआ, घर संचालन के तरीके जानती हूं.

‘‘अब मेरी बात जरा ध्यान से सुन, जीजू को ले कर शाम तक आजा, 2 दिनों की छुट्टी पड़ रही है, खूब मजे करेंगे.

‘‘हां… हां, वह इंतजाम तो मैं कर ही लूंगी…

‘‘तू बच्चों की चिंता न कर, पूरी ट्रेनिंग दे रखी है, खाना खिला कर जल्दी ही सुला दूंगी, फिर तो हमारी मौजां ही मौजां. अकेले तो ये हमें मौका देते नहीं, चलो इन के साथ ही सही.

‘‘तू कहां पर है? मैं ने पहले तो बच्चों के स्कूल की फीस जमा करवाई, फिर पार्लर से फेशियल कराया, अब मैट्रो से घर जा रही हूं.

‘‘ठीक है घर पहुंचते ही मैं बर्फ जमा दूंगी, अब ज्यादा बात नहीं, मुझे जरा इन की भी खबर लेनी है. तू तो बस जल्दी से आजा, ओके, बाय.’’

फिर महिला ने एक और फोन मिला कर कुछ ऊंचे स्वर में कहा, ‘‘हां जी, क्या हो रहा है. मैं तो घंटो फीस की लाइन में लगी रही, अब जमा करवा कर घर जा रही हूं. और सुनो, अभीअभी शीनू का फोन आया था, कह रही थी कि तुम्हारे साढ़ू भाई तुम्हें बहुत याद कर रहे थे, सो मैं ने आज घर पर इनवाइट कर लिया है. शायद कैंटीन से कुछ माल भी ले कर आएंगे.

‘‘अब नखरे न दिखाओ जी, वह तो तुम्हारी बहुत इज्जत करते हैं, हमारा भी तो कुछ फर्ज बनता है. अब कोई नानुकर मत करो, मैं ने तो अब बुला लिया है.

‘‘ठीक है समझ गई, बस आप समझ लो कि आप को जरा जल्दी आना है बस.’’

एक और नंबर मिलाया गया, ‘‘हां सोनिया बेटी, मम्मी बोल रही हूं. अभी तुम दोनों घर पहुंचे या नहीं. ठीक है, घर पहुंच कर दोनों खाना खा लेना. और सुनो मैं ने फैसला किया है कि तुम मरियम आंटी का एक वीक वाला डांस कैंप जौइन कर लो, मैं पैसे दे दूंगी.

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‘‘ओके, ओके वैलकम, ओह मेरे बच्चों. तुम्हारे लिए ही तो मैं सब कुछ करती हूं. लेकिन तुम्हें भी मेरी एक बात माननी होगी.

‘‘वह यह कि रोज रात को जल्दी खाना खा कर 9 बजे से पहले सोना होगा, क्योंकि अगली सुबह डांस कैंप में जाना होगा. इसलिए नो टीवी. ठीक है? मंजूर है न? यह बात जरा राहुल को भी समझा दो.

‘‘वैरी गुड, तो आज से तुम दोनों साढ़े 8 बजे खाना खाओगे और 9 बजे सो जाओगे. कोई नानुकर नहीं सुनूंगी. ओके, बाय मेरे बच्चो.’’

महिला ने शांती से लंबी सांस ली और हलके से कहा, ‘‘लो जी अब तो पार्टी का सारा इंतजाम पक्का हो गया.’’

त्यौहार से सकारात्मकता और बौन्डिंग आती है – प्राजक्ता माली

कई मराठी फिल्मों और टीवी धारावाहिकों में काम करने वाली मराठी अभिनेत्री प्राजक्ता माली एक भरतनाट्यम डांसर है. उन्होंने डांस के क्षेत्र में कई कामयाबी हासिल की और एक डांस शो के दौरान उन्हें अभिनय का भी मौका मिला. वह आज एक स्थापित कलाकार है और कला के माध्यम से दर्शकों को मनोरंजन देना पसंद करती है. उसके इस सफ़र में उसके माता-पिता ने बहुत सहयोग दिया और आज वे उसकी कामयाबी से खुश है. उसे अपना परिवार और उनके साथ समय बिताना बहुत पसंद है. दिवाली का त्यौहार वह अपने परिवार के साथ मनाती है और अपने रिश्तेदारों से मिलने जाती है. अभी वह एक कॉमेडी रियलिटी शो ‘हास्य जत्रा’ में एंकरिंग कर रही है. उनसे बात करना रोचक था, पेश है कुछ अंश.

सवाल-अभिनय के क्षेत्र में आने की प्रेरणा कहां से मिली?

जब में 6 साल की थी तब मेरी मां ने मुझे भरतनाट्यम क्लास में भेजा था. तब से मैं इसे सीख रही हूं और गुरु के नृत्य को परफौर्म करते देख रही हूं, ऐसे में धीरे-धीरे पैशन होता गया. मेरे दो गुरु स्वाति दातार और परिमल फड़के है. जिन्होंने मुझे नृत्य की अच्छी प्रशिक्षण दी. मैंने जब स्टेज पर परफौर्म करना शुरू किया, तो लोग जानने लगे और मुझे अभिनय का अवसर सामने से आने लगा. मैं एक के बाद एक करती गयी और आज यहां पहुंची हूं.

सवाल-अभिनय कब शुरू किया?

प्रोफेशनली अभिनय मैंने साल 2011 से शुरू किया है. इसके बाद जो भी काम आता गया, मैं करती गयी.

सवाल-परिवार का सहयोग कैसा रहा?

मेरी मां ने मुझे बहुत सहयोग दिया है. किसी भी मीटिंग, औडिशन या शूटिंग के समय वह हमेशा मेरे साथ रहती थी. उन्होंने मुझे कभी अकेला नहीं छोड़ा है. मानसिक और वित्तीय रूप से भी उन्होंने बहुत सहयोग दिया. मैं पुणे की हूं,पर अब मुंबई में रहती हूं.

सवाल-पहला ब्रेक कब और कैसे मिला?

शुरुआत में मैंने एक मराठी आर्ट फिल्म ‘सान्धरा’ में एक लीड एक्ट्रेस की यंग चरित्र करने का मौका मिला. फिर मुझे एक शो एंकरिंग का अवसर मिला. इससे मुझे काम करना आगे आसान होता गया.

सवाल-आप एक भरतनाट्यम डांसर है, उस दिशा में आपने क्या-क्या किया है?

मैंने भरतनाट्यम में उच्च शिक्षा ली है और परफोर्मेंस करती हूं. इसके अलावा पुणे में मेरी 7 भरतनाट्यम डांस स्कूल है, जहाँ बहुत सारी लड़कियां डांस सीखती है.

सवाल-संघर्ष कितना रहा ?

बहुत संघर्ष रहा, क्योंकि मैंने डांस सीखा है, जबकि अभिनय बहुत अलग है. शुरू-शुरू में मुझे बहुत मेहनत करने पड़े. क्लासिकल डांस की वजह से अभिनय तो आ जाता है, पर वह बहुत ही लाउड होता है, जो टीवी पर सही नहीं बैठता. किसी भी क्लासिकल डांस में संवाद नहीं होते,केवल आंखों से सब व्यक्त करना पड़ता है. ऐसे में आंखे बड़ी-बड़ी कर संवाद बोलना सही नहीं होता था. टीवी पर उसे सीखना पड़ा. इसे ठीक करने के लिए फिल्में देखना और रीडिंग शुरू किया. टीवी की तकनीक को समझने में समय लगा. अभी काम्प्लेक्स चरित्र करने में भी मुश्किल होता है. मैं अलग-अलग भूमिका करने की कोशिश कर रही हूं और वही बड़ी चुनौती है.

सवाल-हिंदी फिल्मों और वेब सीरीज में कब आ रही है?

हिंदी फिल्मों में भी काम करना है, पर वेब सीरीज के लिए अभी मैं तैयार नहीं. उसमें काफी बोल्ड सीन्स होते है. जिसे करने में मैं सहज नहीं. अगर फिल्म या वेब सीरीज में किसी सीन को कलात्मक दृष्टि से फिल्माया जाता है, तो मैं उसे कर सकती हूं, पर न्यूडिटी मुझे पसंद नहीं. मुझे पैन इंडिया लेवल पर काम करने की इच्छा है.

सवाल-कोई ऐसी प्रोजेक्ट जिसने आपकी जिंदगी बदल दी हो?

जी मराठी पर आई शो ‘जुलूनी येती रेशीमगाठी’ जिसमें मैंने मेघना की भूमिका निभाई थी और शो काफी हिट हुई. उससे मुझे लोकप्रियता मिली. उसके बाद मैंने कई शो किये. वित्तीय रूप से मजबूत बनी और अपना घर मुंबई में ले लिया. इसके बाद मेरी दूसरी शो ‘नक्तिच्या लग्नाला यायचा हा’ भी सफल रही. इस शो को करते-करते मैं अंदर से खुश होती गयी. इससे मुझे उसे करने में भी अच्छा लगने लगा था.

सवाल-आप रियल लाइफ में कैसी है?

मैं कई सारे ह्यूमन बीइंग की मिक्सर हूं. हर परिस्थिति में मैं अपने आप को ढाल लेती हूं और खुश रहना पसंद करती हूं.

सवाल-आप कितनी फैशनेबल और फूडी है?

मैं आरामदायक वस्त्र पहनना पसंद करती हूं. इसके अलावा मैं वेजिटेरियन हूं और महाराष्ट्रियन फ़ूड पसंद करती हूं. सब लोग वेजिटेरियन हो ये भी बताती रहती हूं.

सवाल-क्या कोई ड्रीम है?

मुझे ‘बाहुबली’ की तरह फिल्में पसंद है और वैसी फिल्में हिंदी में करना चाहती हूं.

सवाल-त्यौहार को मनाना क्यों जरुरी है? दिवाली को कैसे मनाती है? बचपन की कुछ यादें जिसे आप शेयर करना चाहे? गृहशोभिका के लिए मेसेज क्या है?

त्यौहार को मनाना बहुत जरुरी है, ये एक सोशल गेदरिंग होता है, जहां पता चलता है कि आपकी ख़ुशी में कोई और शामिल है. अकेलापन नहीं आता. ये अनुभव आज बहुत जरुरी हो गया है. इससे जो सकारात्मकता और बॉन्डिंग आती है वह व्यक्ति को रिफ्रेश करती है, जो काफी समय तक साथ में रहता है. दिवाली भी ऐसी ही एक त्यौहार है, जिसमें दिए जलाकर घर को रौशनी से भर दिया जाता है. जो हम कभी बाद में नहीं करते. सारे त्यौहार व्यक्ति के तनाव को दूर कर उनमें उमंग भर देते है, इसलिए इसे मनाना जरुरी है.बचपन से ही मैं इसे मनाती आ रही हूं. इस दिन मैं रंगोली बनाती हूं और बहुत सारे दिए जलाती हूं. नए कपड़े आज भी पहनती हूं. मराठी व्यंजन घर पर दिवाली के बाद भी एक महीने तक बनता रहता है.

महिलाएं अपने लिए समय निकाले और सबके साथ त्यौहार को मनाये. इसमें पुरुष भी भागीदार बनें.

सर्दियों में इन 5 टिप्स से ग्लोइंग रहेगी स्किन

सर्दियों में स्किन रूखी और बेजान हो जाती है. ऐसे में शादी हो या पार्टी मेकअप का इस्तेमाल बहुत सोच समझ कर करना होता है. रूखी स्किन पर ग्लो कहीं खो जाता है. ऐसे में मेकअप से भी निखार नहीं आ पाता. कई बार मेकअप चेहरे के ड्राई एरिया पर जम जाता है तो दिखने में बहुत भद्दा लगता है. इसलिए सर्दियों में स्किन की देखभाल बहुत जरूरी है. अगर आपकी स्किन हेल्दी दिखेगी तो मेकअप भी जल्दी सेट होगा. आइए जानते है सर्दियों में ग्लोइंग मेकअप के साथ स्किन को हेल्दी रखने का कुछ आसान टिप्स.

 ऐसे रखें स्किन को हेल्दी

 1. घरेलू मोइश्चराइजर का करें इस्तेमाल

सर्दियों में स्किन का रूखा होना और फिर उस रूखी स्किन में खुजली होना बहुत आम समस्या है. सर्दियों की शुष्क हवा स्किन की नमी सोख लेती है, जिस वजह स्किन का फटना और जलन जैसे समस्याएं होने लगती है. इनसे बचने के लिए आप घर पर ही मोइश्चराइजर का इस्तेमाल कर सकती हैं.

2 चम्मच शहद में बादाम का पेस्ट बनाकर मिलाएं और 4 चम्मच पानी मिला कर इसका मिश्रण तैयार कर लें और इसे चेहरे पर लगा कर सूखने दें. जब यह अच्छी तरह सुख जाए तो इसे गरम पानी से धो लें.

शहद आपकी स्किन को नैचुरल चमक देता है. इसके इस्तेमाल से स्किन का रूखापन आसानी से दूर हो जाता है. इस में एंटीऑक्सिडेंट्स, एंजाइम्स व कई अन्य पोषक तत्व मौजूद रहते है जो स्किन को पोषण प्रदान करते है, उसे साफ रखते है व नमी प्रदान करते है.

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इसके इस्तेमाल के बाद आप मोइश्चराइजर लोशन का भी प्रयोग कर सकती हैं.

मौइश्चराइजर स्किन को हाइड्रेट करने का काम करता है. यह चेहरे के रोमछिद्रों को बंद होने नहीं देता.

2. नैचुरल स्क्रब का करें इस्तेमाल

सर्दियों में रुखेपन से छुटकारा पाने के लिए स्क्रबिंग बहुत जरूरी है. स्क्रबिंग से चेहरे पर जमे हुए डेड स्किन, व्हाइट हेड्स और ब्लैक हेड्स आसानी से निकल जाती है.

नैचुरल स्क्रब के लिए आप कौफी का इस्तेमाल कर सकती हैं. कौफी में मौजूद कैफीन हर तरह की स्किन समस्याओं से निजात दिलाने में मदद करता है. कौफी डेमेज स्किन को रिपेयर करने में मदद करता है.

कौफी स्क्रब बनाने के लिए ग्राउंड कौफी का इस्तेमाल करें. इस में ब्राउन शुगर और ऑलिव ऑइल को अच्छे से मिला लें. अब इस मिश्रण को सर्कुलर मोशन में चेहरा पर मसाज करें.

3. सनस्क्रीन है जरूरी

सर्दी हो या गर्मी सनस्क्रीन चेहरे के लिए बहुत जरूरी है. अधिकतर महिलाओं को लगता है की सनस्क्रीन  सिर्फ गर्मियों में ही लगानी चाहिए. लेकिन उनका यह मानना गलत है सर्दी हो या गर्मी सनस्क्रीन  का इस्तेमाल हर मौसम में हर दिन करना चाहिए. गर्मियों में UVB किरणें ज्यादा पड़ती है. जो स्किन के लिए खतरनाक होती है. लेकिन सर्दियों के मौसम में UVB के मुक़ाबले UVA किरणें ज्यादा पड़ती है. जिससे आपकी स्किन पर सनबर्न, झुर्रियां, काले धब्बे हो सकते हैं. इसलिए सर्दियों में सनस्क्रीन  का इस्तेमाल जरूर करें.

4. रात को लगाएं नारियल तेल

सर्दियों के मौसम में ड्राई स्किन पर नारियल तेल बहुत अच्छा काम करता है. नारियल तेल आपकी स्किन को प्राकृतिक रूप से मुलायाम और चमकीला बनाता है. स्किन को मोइश्चराइज करने के अलावा यह स्किन से मुंहासों, दाग धब्बों को भी मिटाने में मदद करता है.

नारियल तेल का इस्तेमाल आप नाइट क्रीम की तरह कर सकतीं हैं. रात को मुंह धोने के बाद चेहरे पर नारियल तेल लगा कर सो जाए. सुबह आपको आपकी स्किन मुलायम और ग्लोइंग नजर आएगी.

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5. खाने पीने का रखें खास ध्यान

इस मौसम में खाने पीने का खास ध्यान रखना पड़ता हैं. इस मौसम में फ्राइड और मीठी चीजें खाना अच्छा लगता है, लेकिन अगर आप फिट रहना चाहते हैं तो रोस्टेड चीजें ज्यादा खाएं. फिश, सूप और ड्राई फ्रूट्स लें. मौसमी सब्जियां, टमाटर, पालक, लहसुन, संतरा और पपीता सेहत के साथ स्किन के लिए भी लाभकारी होते हैं टमाटर में केरोटीन तत्व होता है, जो रक्त को साफ करता है. हरी सब्जियों का अधिक सेवन करें. रोज सुबह एक चमच शहद जरूर खाए. रोजमर्रा के डेयरी प्रोडक्ट्स पर ज्यादा ध्यान दें. साथ ही अंजीर, किशमिश, ड्राई फ्रूट्स और पर्याप्त मात्रा में हरी सब्जियों को शामिल करें.

क्या करें जब कोई मारे ताना

लेखक- पूजा पाठक

क्षिप्रा के घर किट्टी पार्टी चल रही थी. अचानक घड़ी पर नजर पड़ते ही रागिनी उठ कर चल दी.

‘‘अरे अभी तो 5 ही बजे हैं, 6 बजे तक चली जाना,’’ क्षिप्रा ने उस का हाथ पकड़ कर चिरौरी की.

‘‘माफ करना. मुझे तो कल सुबह औफिस जाना है. अब तेरी तरह हाउसवाइफ तो हूं नहीं कि आराम की जिंदगी जी सकूं. मुझे तो घरबाहर दोनों देखना होता है,’’ रागिनी ने महीन ताना करते हुए कहा. अपनेपन से पकड़े गए हाथ की पकड़ ढीली हो गई. क्षिप्रा ने सामने कुछ नहीं कहा लेकिन इस एक व्यंग्य से दोनों सखियों की दोस्ती में एक अनकही दरार तो आ ही गई.

कई लोग व्यंग्य, फब्तियां कसने, ताना देने और किसी के मजे लेने को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं. पर वास्तव में इस के पीछे उन की जलन की भावना काम करती है. उक्त परिदृश्य में भी किट्टी पार्टी के दौरान क्षिप्रा के घर की साजसंभाल को ले कर हो रही तारीफ रागिनी आसानी से हजम नहीं कर पाई और न चाहते हुए भी उस के मुंह से क्षिप्रा को नीचा दिखाने वाली बात निकल गई, जिस ने पार्टी का माहौल तो बोझिल किया ही साथ ही 2 सखियों के बीच मनमुटाव को भी जन्म दे दिया.

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क्या है इस मानसिकता की वजह

आखिर ताना करने के पीछे किसी का क्या मंतव्य हो सकता है. दरअसल, जब आप किसी को सुपीरियर देखते हैं तो मन में एक स्वाभाविक जिज्ञासा उठती है कि आखिर वह हम से बेहतर कैसे? बस यहीं एक सकारात्मक विचार वाला व्यक्ति इस बात को प्रशंसात्मक रूप में ले कर सामने वाले की प्रशंसा करता है. उस के हुनर या प्रतिभा से सीखने की कोशिश करता है जबकि हीनभावना से ग्रसित इंसान उक्त व्यक्ति से ईर्ष्या, द्वेष व जलन की भावना रखने लगता है और अंतत: आसानी से दुराग्रह की चपेट में आ कर उसे नीचा दिखा कर दुखी करने की फिराक में लग जाता है.

इस किस्म के लोग वास्तव में बीमार मानसिकता के गुलाम होते हैं. उन्हें दूसरों की खूबसूरती, प्रतिभा, खुशी या सफलता रास नहीं आती. जब वे अपनी इस भावना पर अंकुश नहीं लगा पाते तब उन के मुंह से ताना निकल जाते हैं जो सामने वाले को अप्रत्यक्ष रूप से अपमानित करने के लिए होते हैं.

कभीकभी ये ताना किसी बदले की भावना के तहत किए जाते हैं या शायद अपनी खुन्नस निकालने के लिए भी. बहरहाल, ये वाक्य शब्दों को घुमाफिरा कर इस तरह से कहे जाते हैं ताकि साफसाफ उन पर कोई आरोप न आए और वक्त पड़ने पर वे यह कह कर अपना बचाव भी कर सकें कि मैं ने तो ऐसे ही कह दिया था. मेरा वह मतलब नहीं था.

बचने का रास्ता

आखिर ऐसा क्या करें कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे. यानी उसे आईना भी दिखा दें और स्वयं भी दुखी न हों, आइए जानते हैं:

– इस बात को ज्यादा तरजीह न देते हुए उस वक्त यह सोच कर चुप्पी साध जाएं कि आप पर फब्तियां कसना उस की कमजोरी है. हां, बाद में सही वक्त देख कर उस के मन में अपने लिए बैठे मैल को दूर करने का प्रयास करें.

– उस की जो भी खूबी आप को भाती हो उस की दिल खोल कर तारीफ करें, ताकि वह स्वयं ही अपनी करनी पर शर्मिंदा हो कर आप के प्रति दोगुने सम्मान से भर उठे.

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– उसे साफ शब्दों में ऐसी कोई बात न कहने के लिए जरूर कहें. इस से वह सचेत हो जाएगा और किसी और से भी ऐसा व्यवहार करने से पहले कई बार सोचेगा.

तो यह फैसला व्यक्ति या परिस्थितियां देख कर आप को स्वयं लेना होगा कि किसी के द्वारा ताना किए जाने पर आप की क्या प्रतिक्रिया होनी चाहिए. सिर्फ इतना निश्चित करना पड़ेगा कि किसी के ताना पर आप अपना दिल न दुखाएं और न ही स्वयं बेवजह किसी पर कोई व्यक्तिगत आक्षेप या टिप्पणी करें.

 यहां छिपाएं कीमती सामान

अगर आप भी अपने घर का कीमती सामान चोरी होने के खतरे से परेशान हैं तो आज हम आपको अपना कीमती सामान कहां रखें, इसके लिए कुछ टिप्स बताएंगे. ऐसी कई जगहें घर में होती हैं जहां आप कीमती सामान रख कर बेफिक्री से कहीं भी आजा सकते हैं और वापस आ कर सामान सलामत पा सकते हैं:

1. तेल की केन की तरह एक सुरक्षित जगह पानी की टंकी होती है जिस पर आमतौर पर चोरों का ध्यान नहीं जाता. हर घर में पानी की टंकी अकसर ऐसी जगह होती है जहां चोरों का पहुंचना अलमारियों की तरह आसान नहीं होता. गहने इन में छिपाए जा सकते हैं.

2. अव्वल तो ज्यादा नगदी घर में रखना ही नहीं चाहिए लेकिन किसी वजह से रखना भी पड़े तो घर से बाहर जाते वक्त उसे टुकड़ोंटुकड़ों में अखबारों की रद्दी के बीच रखना चाहिए. यह काम बीचोंबीच से करें तो और भी बेहतर है.

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3. स्टोररूम घर की एक ऐसी जगह होती है जिस में दुनियाभर का कूड़ाकबाड़ा भरा रहता है. इस में किसी भी जगह गहने आदि छिपाए जा सकते हैं. चोरों के पास चोरी करते समय सीमित समय होता है. इसलिए वे स्टोररूम की एकएक चीज नहीं देखेंगे.

4. आमतौर पर चोर यह मान कर चलते हैं कि कीमती सामान घर के अंदर ही कहीं रखा रहेगा. इसलिए वे घर के प्रवेशद्वार या पहले कमरे को टारगेट नहीं करते. यहां गहने, नगदी आदि छिपाए जा सकते हैं. फिर भले ही वह शू रैक हो.

5.  पक्के घरों में गड्ढे करना संभव नहीं होता. लेकिन गमलों को खाली कर उन में गहने भर कर ऊपर से गीली मिट्टी डाली जा सकती है. बच्चों के स्कूल बैग भी कीमती चीजों को रखे जाने के काम आ सकते हैं. छोटी अंगूठियां व दूसरे छोटे आइटम दवाइयों की बड़ी शीशियों में डाल कर बचाए जा सकते हैं.

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क्या शो बंद होने के बाद ‘बिग बौस’ का हिस्सा बनेंगी सुरुभि, सामने आई फोटो

टीवी की पौपुलर एक्ट्रेसेस में से एक सुरभि चंदना का शो ‘संजीवनी 2’ जल्द ही औफ एयर होने वाले की खबरें फैली हैं, जिसके बाद अब लगता है कि सुरभि को शो बंद होने से पहले ही नए शो में एंट्री मिलने वाली है. आइए आपको बताते हैं किस शो में नजर आने वाली हैं सुरभि चंदना…

बिग बौस 13 शो में आ सकती हैं नजर

खबरें हैं कि सुरभि जल्द ही कलर्स के पौपुलर शो बिग बौस के 13वें सीजन के वीकेंड का वार एपिसोड में नजर आ सकती हैं या फिर कहा जा रहा है कि वह शो में वाइल्ड कार्ड एंट्री के जरिए शो का हिस्सा बनती नजर आएंगी.


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बिग बौस 13 के सेट की फोटोज हुई वायरल

 

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इन फोटोज में सुरभि को इंडो वेस्टर्न लुक में देखा गया है और इस ड्रेस में वह काफी ग्लैमरस नजर आ रही है. सुरभि की ये फोटोज बिग बौस के सेट पर ली गई है. खास बात ये है कि फोटोज सोशल मीडिया पर फोटोज शेयर होने के बाद से ये लगातार वायरल हो रही है.

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बिग बौस की थीम से मैचिंग करती दिखीं सुरभि

हाल ही में वायरल हुई फोटोज में सुरभि बिग बौस की थीम से मैच करते हुई ड्रेस में नजर आईं, जिसकी तारीफ फैंस कर रहे हैं. वहीं कुछ फैंस का कहना है कि अगर वह बिग बौस 13 का हिस्सा बनेंगी तो शो में और भी मजेदार फन देखने को मिलेगा.

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बिग बौस के कंटेस्टेंट्स की लगा सकती है क्लास

 

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Sing A Song ? Mumaa must be soo proud ? – @smilepleasephotographyy

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वहीं अगर सुरभि वीकेंड के वार में नजर आएंगी तो इस बात के चांसेस हैं कि सुरभि सलमान खान के साथ बिग बौस 13 कंटेस्टेंट की वाट लगाते हुए नजर आएंगी. अब देखना ये है कि आने वाले एपिसोड में बिग बौस 13 में क्या ट्विस्ट आते हैं.

खड़ूस मकान मालकिन के घर फेस्टिवल

लेखक- पारुल श्री

सलोनी और नेहा दिल्ली के मयूर विहार क्षेत्र में किराए के 2 कमरों के फ्लैट में रहती हैं. 25 साल की सलोनी नौकरीपेशा है और एक मार्केटिंग कंपनी में काम करती है. वहीं 23 वर्षीया नेहा पढ़ाई के साथसाथ अपने आर्ट व क्राफ्ट के काम में रुचि रखती है.  ऐसे तो 2 कमरों के फ्लैट में सलोनी और नेहा को किसी चीज की कमी नहीं है, लेकिन नीचे वाले फ्लोर पर रह रहीं मकान मालकिन से वे परेशान रहती हैं.

मिस्टर ऐंड मिसेज शर्मा ने अपने फ्लैट के ऊपर वाले हिस्से को किराए पर दिया हुआ है और नीचे वाले हिस्से में खुद रहते हैं. मिस्टर शर्मा सरकारी नौकरी से रिटायर्ड 62 वर्षीय शांत व सरल स्वभाव वाले व्यक्ति हैं, तो 54 वर्षीया मिसेज शर्मा तेजतर्रार महिला हैं. किराए के लेनदेन से ले कर बाकी सभी चीजों का इंतजाम वे खुद देखती हैं.

नेहा और सलोनी अपनी मकानमालकिन की हर बात पर रोकटोक वाले रवैए से परेशान हैं. रात में लेट नहीं आना, गैस्ट को नहीं बुलाना, पानी और बिजली का बिल अलग से देने के बावजूद इतना नहीं खर्च करना और ज्यादा इलैक्ट्रिक चीजें नहीं इस्तेमाल करनी जैसी बेवजह की दखलंदाजी से दोनों ही दुखी हैं.

शाम को नौकरी से लौटने पर सलोनी थोड़ा सुकून और शांति चाहती है लेकिन मकान मालकिन की तेज आवाजें उसे शांति नसीब नहीं होने देतीं. नेहा भी कालेज से आने के बाद पढ़ाई के बीच हर आधे घंटे पर किसी न किसी बात में मिसेज शर्मा की टोकाटाकी से परेशान हो जाती है.

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‘‘पता नहीं किस पर चीखती रहती हैं,’’ सलोनी ने परेशान होते हुए नेहा से कहा.

‘‘कभी मेड तो कभी राशन वाला तो कभी माली और लगभग हमेशा ही मिस्टर शर्मा होते हैं मिसेज शर्मा के शिकार,’’ नेहा ने कहा तो दोनों ही हंसने लगीं.

खड़ ूस मालकिन की न, तो न

‘‘अगले हफ्ते फेस्टिवल है, क्यों न घर को थोड़ा चमका लिया जाए,’’ नेहा ने सलोनी से कहा. सलोनी ने हामी भर दी.

लेकिन इस के लिए मकान मालकिन की अनुमति जरूरी थी, लिहाजा दोनों मिसेज शर्मा से बात करने गईं. जब मिसेज शर्मा ने कमरे में पेंट कराने की बात सुनी तो सीधा मना कर दिया.

उन का कहना था पिछले साल फेस्टिवल पर पेंट कराया था, इस साल जरूरत नहीं है.

‘‘लेकिन आंटी, दीवारें काफी खराब हो गई हैं, कई जगह से पेंट्स की परतें भी उखड़ गई हैं,’’ नेहा ने रोनी सी सूरत बना कर कहा तो सलोनी ने भी हां में हां मिलाते हुए कहा, ‘‘आंटी, पेंट हम खुद करा लेंगे, आप बस परमिशन दे दीजिए.’’

लेकिन मिसेज शर्मा की न, हां में नहीं बदली.

सलोनी और नेहा चिढ़ती हुई शक्लें बना कर वापस लौट आईं.

‘‘यार, लगता है इन्हीं सड़ी दीवारों के साथ फेस्टिवल की डैकोरेशन करनी पड़ेगी,’’ नेहा ने उतरी हुई शक्ल के साथ कहा तो दोनों अपनाअपना माथा पकड़ कर बैठ गईं.

लेकिन, नेहा भी हिम्मत हारने वालों में से नहीं थी. सो, उस ने मिस्टर शर्मा से जा कर मिन्नतें कींऔर मिसेज शर्मा अपने पति की बात को टाल नहीं सकीं.

नेहा ने खुशीखुशी उन्हें धन्यवाद कहा और पूरे घर को पेंट कराने की तैयारी करने लगी.

पानी पर हंगामा

पूरे घर की पेंटिंग के बाद दोनों ने सफाई अभियान शुरू किया. नेहा ने घर में पोंछा लगाना शुरू ही किया था कि मकान मालकिन आ गईं और पानी के इस्तेमाल के लिए हंगामा कर दिया.

नेहा ने उन्हें सम झाते हुए कहा कि हम पानी का पूरा बिल भरते हैं और बरबादी न हो, इसलिए कम पानी में ही सफाई कर रहे हैं.

लेकिन मकान मालकिन को तो हर बात में दिक्कत थी, सो, आधे घंटे पानी पर लैक्चर दिया, जिसे दोनों ने चुपचाप से सुना और फिर उन के जाने के बाद वापस सफाई करने लग गईं.

डैकोरेशन से सत्यानाश

धीरेधीरे फेस्टिवल का दिन भी नजदीक आ गया. सलोनी और नेहा ने जम कर शौपिंग की. पूरे घर को सजाने के लिए नेहा ने ढेर सारे डैकोरेटिव फ्लौवर्स और बंदनवार लिए थे. फेस्टिवल के दिन पहले दोनों ने मिल कर दरवाजे से ले कर कमरों तक को सजाना शुरू किया.

तभी अचानक मिसेज शर्मा आ गईं और सलोनी से बोलीं, ‘‘तुम लोगों ने पूरे घर का सत्यानाश कर दिया है. सभी दीवार और दरवाजेखिड़कियों को खराब कर दिया. यह सैलो टेप की गोंद से सारा पेंट उखड़ जाएगा. कीलें मत लगाओ, दीवार में छेद होंगे.’’

गुस्से से मिसेज शर्मा ने कहा तो दोनों ने उन्हें प्यार से सम झाया, ‘‘आंटी, यह टेप आर्टिस्टिक टेप है. इस से पेंट बिलकुल भी नहीं निकलता और ये कील लोहे की नहीं हैं. इन्हें वायर क्लिप्स या यू क्लिप्स कहते हैं और इन से दीवार में छेद बहुत ही छोटा होता है जिस से दीवार को नुकसान नहीं होता. आखिर, इस घर में हम भी रहते हैं तो इसे गंदा कैसे कर सकते हैं.’’

नेहा ने प्यार से उन से कहा तो मिसेज शर्मा उन्हें और कुछ न लगाने की हिदायत दे कर चली गईं.

हलकी सी खुशी

मिसेज शर्मा की दबी हुई अनुमति पा कर दोनों ने पूरे घर को अच्छे से सजाया. फेस्टिवल की सुबह मिल कर कई सारी डिशेज और मिठाइयां बनाईं. फिर एक सुंदर सी रंगोली बनाई. लेकिन, मिसेज शर्मा की आवाज ने एक बार फिर उन्हें सतर्क कर दिया. इस बार उन्होंने डांट नहीं लगाई, बल्कि उन की बनाई रंगोली की तारीफ की और साथ ही फेस्टिवल के दूसरे दिन सफाई करने को कह गईं.

पार्टी रूल्स

शाम को मिठाई और खीर की प्लेट ले कर नेहा और सलोनी मिस्टर ऐंड मिसेज शर्मा के पास गईं. मिस्टर शर्मा ने खुशी से मिठाइयां खाईं लेकिन मिसेज शर्मा ने फिर से एक जरूरी घोषणा कर दी, ‘‘रात के 8 बजे तक सब शोरशराबा खत्म हो जाना चाहिए और मु झे घर पर ज्यादा लोगों की भीड़ नहीं पसंद, इसलिए बहुत ही कम लोगों को बुलाना.’’

मिसेज शर्मा के ऐसा कहते ही नेहा ने आंटी के हाथ में मिठाई दी और कहा, ‘‘आंटी, आप बेकार की टैंशन मत लो. आज फेस्टिवल है, कुछ मत कहो और गले लग जाओ.’’

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गेस्ट्स के सामने चिकचिक

शाम तक दोनों के सभी फ्रैंड्स भी एकएक कर के आ गए तो नेहा ने म्यूजिक सिस्टम औन किया और फिर सब डांस करने लगे. खानापीना और मस्ती के बीच म्यूजिक कब तेज हो गया, पता ही नहीं चला. पता तो तब चला जब मिसेज शर्मा की तेज आवाज कानों से टकराई, ‘‘इतनी तेज म्यूजिक यहां पर नहीं बज सकता. ये सब अभी बंद करो और सब अपनेअपने घर जाओ.’’

‘‘लेकिन आंटी, अभी तो सिर्फ 7.30 बजे हैं,’’ नेहा की दोस्त पूजा ने धीमी आवाज में कहा तो सभी ने उन से रिक्वैस्ट की, जिस के बाद मिसेज शर्मा कुछ कह नहीं पाईं.

लाइट्स पर पाबंदी

बिजली का पूरा बिल देने के बाद भी मकान मालकिन को लाइट्स की  झालरें जलाने पर आपत्ति थी. उन्होंने फिर दोनों को इस बात के लिए सुनाया और लाइट्स बंद करने को कहा. सलोनी ने रात के 10 बजे तक लाइट्स बंद करने का वादा कर जैसेतैसे बात को खत्म किया.

पटाखों पर बैन

म्यूजिक को धीमी आवाज पर चला कर सब ने डांस किया और फिर पटाखे ले कर ग्राउंड पर चले गए. अभी 2-4 ग्रीन पटाखे ही जलाए थे कि फिर से उन की मस्ती में मिसेज शर्मा ने आ कर खलल डाल दी, ‘‘अब एक और पटाखा नहीं फूटेगा.’’

अब तो नेहा के सब्र का बांध ही टूट गया. गुस्से में आ कर उस ने कहा, ‘‘आप की आवाज से तो कम ही तेज है पटाखों की आवाज.’’

इस से पहले वह कुछ और बोलती सलोनी ने मिसेज शर्मा को गले से लगाते हुए ‘हैप्पी फेस्टिवल’ विश किया.

मिसेज शर्मा उस की इस हरकत से हैरान हो ही रही थीं कि सलोनी ने कहा, ‘‘अंकल, आंटी, हम सब घर से दूर हैं, अपनी फैमिली से दूर हैं. ऐसे में हमारे लिए आप दोनों ही हमारी फैमिली हैं. अगर मस्ती करने के चक्कर में हमारी वजह से परेशानी हुई हो तो माफ कर दें. फेस्टिवल तो मिलजुल कर प्यार और खुशियां बांटने का त्योहार है. ऐसे में अगर आप नाराज होंगी तो हमारी फेस्टिवल का कोई मतलब नहीं रहेगा.’’

सलोनी के इतना कहते ही मिसेज शर्मा ने उसे गले से लगा लिया. सभी ने मिस्टर ऐंड मिसेज शर्मा को फेस्टिवल की बधाइयां दीं और फिर सब ने मिल कर मौजमस्ती की. सलोनी और नेहा ने जब अपनी खड़ ूस मकान मालकिन और उन के पति को फेस्टिवल गिफ्ट्स दिए तो उन की भी आंखों में खुशी के आंसू आ गए.

कहीं आप भी तो अपनी फेस्टिवल पर अपनी खड़ ूस मकान मालकिन की रोकटोक के बारे में तो नहीं सोच रहे? अगर सोच रहे हैं तो परेशान होने की बात नहीं है. उन्हें अपना बड़ा मान कर उन की बातों को दिल से न लगाएं. वे भी इंसान हैं. एक बार आप की बातों को नहीं सम झेंगे लेकिन अगर आप उन्हें प्रेमपूर्वक सम्मान दे कर अपनी बातों को सम झाएंगे तो जरूर सम झ जाएंगे.

घर से दूर रहने पर बाहर वालों के साथ अच्छा व्यवहार रखने से हमारा नुकसान नहीं होता. हां, अगर आप के अच्छे व्यवहार का फायदा उठाया जाए तो वहां सामने वाले की गलती बताने में भी पीछे नहीं रहना चाहिए. आप जहां रहते हैं वहां के लोगों के साथ फेस्टिवल जैसे हर त्योहार की खुशियां शेयर करने की सोचें.

फेस्टिवल मिलजुल कर खुशियां मनाने वाला त्योहार है, तो एकदूसरे के साथ प्यार बांटने में हर्ज ही क्या है. चाहे वे हमारे अपने हों या न हों, फेस्टिवल तो सब की फेस्टिवल है.

ऐसी छोटीछोटी बातों का ध्यान रखा जाए तो आप की फेस्टिवल भी खराब नहीं होगी और क्या पता आप की खड़ूस मकान मालकिन भी खड़ूस न रहे.

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एयर पौल्यूशन से स्किन को बचाने के लिए करें ये काम

बड़े शहरों में रहने वाले लोगों के लिए वायु प्रदूषण के दुष्प्रभावों से बचना मुश्किल होता जा रहा है. इसका असर शरीर के लगभग हरेक अंग पर पड़ता है. दिल्ली जैसे शहर वायु प्रदूषण से अत्यधिक प्रभावित हैं, वहीं लंदन और पेरिस की एयर क्वालिटी भी खराब है.

 स्किन प्रौब्लम

स्किन हमारे शरीर के भीतरी अंगों को बाहरी दुष्प्रभावों से बचाकर रखने वाला सबसे बड़ा अंग है, और इस पर बाहरी तत्वों का असर पड़ता है. इन समस्याओं में स्किन का शुष्क पड़ना, रैशेज़ होना, एलर्जी, झुर्रियां, पिग्मेंट उभरना, एक्ज़ीमा और तेजी से स्किन का बुढ़ाना शामिल है. वायु प्रदूषण से हवा में फ्री रैडिकल्स की मात्रा बढ़ती है और अल्ट्रावायलेट किरणों के साथ मिलकर ये स्किन में कोलेजन की मात्रा को घटाते हैं. इस तरह, स्किन का लचीलापन घटने लगता है जिसके परिणामस्वरूप महीन रेखाएं और झुर्रियां उभरती हैं. हवा में विषाक्तता बढ़ने से, स्किन कोशिकाओं को मिलने वाली आॅक्सीजन की मात्रा भी कम होती है, जिसके चलते वह बेरौनक और थकान भरी दिखती है.

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 पिग्मेंटेशन

वाहन प्रदूषण की वजह से हवा में मौजूद महीन कण स्किन पर पिग्मेंटेशन का कारण बनते हैं. नए शोध से यह सामने आया है कि हवा में मौजूद पॉलीसाइक्लिक एरोमेटिक हाइड्रोकार्बन, नाइट्रोजन डायआॅक्साइड तथा अन्य रसायनों से स्किन की एजिंग काफी तेजी से होती है. ‘फ्रंटियर्स आॅफ एन्वायरनमेंटल साइंस’ जर्नल में प्रकाशित आलेख ‘एयर पॉल्यूशन एंड द स्किन’ में चेताया गया है कि ‘स्किन पर वायु प्रदूषकों से स्किन की एजिंग, एटोपिक डर्मेटाइटिस, स्किन कैंसर, सोरायसिस और एक्ने’ जैसी समस्या बढ़ सकती है.

यहां ध्यान देने वाली बात है कि हम सिर्फ घर से बाहर होने पर ही प्रदूषण के संपर्क में नहीं आते, बल्कि घरों के अंदर कई बार इनका असर और भी खतरनाक हो सकता है.

बेशक, यह हमेशा मुमकिन नहीं होता कि हम शहरों को छोड़कर गांवों में जा बसें, लेकिन अपनी स्किन पर वायु प्रदूषण के दुष्प्रभावों को कम करने के लिए निश्चित ही काफी कुछ किया जा सकता है. घरों को धूल—धक्कड़ मुक्त रखना सबसे जरूरी है. घरों में सामान फैला नहीं होना चाहिए ताकि साफ—सफाई ठीक से हो जाए. वैक्यूम क्लीनिंग और गीला पोछा लगाने तथा गीले कपड़े से धूल हटाने डस्टिंग की सलाह दी जाती है. बाज़ार में कई एयर प्योरीफायर्स उपलब्ध हैं जो प्रदूषण कम करने का दावा करते हैं, लेकिन ये दावे किसी साक्ष्य पर आधारित नहीं हैं और हो सकता है कि उतने प्रभावी भी नहीं हों जितना दावा किया जाता है. लेकिन यदि वे मामूली मात्रा में धूल—धक्कड़ या प्रदूषणकारी कणों को हटाने में कारगर हैं, तो कुछ न होने से तो बेहतर ही है.

 उपाय

​प्रदूषण स्तरों के अधिक होने पर, पूरी बाजू के कपड़े पहनने से स्किन को ​कुछ सुरक्षा मिल सकती है. अच्छी क्वालिटी की सनस्क्रीन लगाएं, सर्दियों में भी सूरज की किरणों से अपना बचाव करने के लिए इनका इस्तेमाल करें. इसी तरह, अच्छी क्वालिटी का मिनिरल मेकअप लगाने से भी कुछ हद तक शारीरिक सुरक्षा का लाभ मिलता है.

स्वस्थ स्किन सबसे कारगर सुरक्षा कवच होती है और स्वस्थ शरीर से स्किन को बढ़िया पोषण मिलता है. सेहतमंद, संतुलित खुराक लेना, धूम्रपान न करना, कम शराब का सेवन और नियमित व्यायाम से शरीर स्वस्थ बना रहता है. क्लीनिंग, टोनिंग और मौयश्चराइज़िंग से स्किन की नियमित देखभाल करें. सुबह—शाम इस प्रक्रिया से स्किन को पोषण दें. स्किन को हाइड्रेट करने के लिए पानी पीएं.

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 स्किन रीज्युवनेशन

स्किन रीज्युवनेशन इन दिनों काफी चर्चा में है और कौस्मेटिक सर्जन अब केमिकल पील्स, पीआरपी थेरेपी जैसी आसान तकनीकों से स्किन में सुधार लाने के विकल्प उपलब्ध कराने लगे हैं. इसी तरह, स्किन को सुरक्षित रखने तथा पोषित करने के लिए बेहतर क्वालिटी के कौस्मेटिक्स तैयार करने के क्षेत्र में भी काफी शोध जारी हैं.

 डॉ अनूप धीर, सीनियर कंसल्टैंट, कॉस्मेटिक सर्जन, अपोलो अस्पताल से बातचीत पर आधारित.

घर का भूला भाग-2

पिछला भाग- घर का भूला भाग-1

लेखिका- डा. छाया श्रीवास्तव

कुछ दिनों बाद आभा को फिर झटका लगा, देखा कि वह मम्मी की महंगी साड़ी और चमड़े की चप्पल पहने रसोई में खाना बना रही है. उस का मन जल उठा. उस की मम्मी कभी चमडे़ की चप्पल पहन कर रसोई में नहीं जाती थीं और यह नवाबजादी मजे से पहने खड़ी है. वह तेज स्वर में बोली, ‘‘मालती, तुम चमडे़ की चप्पल पहने खाना बना रही हो? यह मम्मी की महंगी साड़ी और यह नई पायल तो मम्मी करवा चौथ पर पहनने को लाई थीं, ये चीजें तुम्हें कहां मिलीं?’’ क्रोध से उस का मुंह लाल हो गया.

‘‘ये सब तुम अपने पापा से पूछो बेबी, उन्होंने मुझ से अलमारी साफ करने को कहा तो पौलीथीन की थैली नीचे गिरी. मैं ने साहब को उठा कर दी तो वह बोले तुम ले लो मालती, आभा तो यह सब नहीं पहनती, तुम्हीं पहन लो. उन्होंने ही सैंडिल भी दी, सो पहन ली.’’

‘‘देखो, यहां ये लाट साहिबी नहीं चलेगी, चप्पल उतार कर नंगे पांव खाना बनाओ समझी,’’ वह डांट कर बोली तो मालती ने सकपका कर चप्पल आंगन में उतार दीं. अमित भी बोल उठा, ‘‘पापा, यह आप क्या कर रहे हैं? क्या अब मम्मी के जेवर भी इस नौकरानी को दे देंगे? उन की महंगी साड़ी, सैंडिल भी, ये सब क्या है?’’

‘‘अरे, घर का पूरा काम वह इतनी ईमानदारी से करती है, और कोई होता तो चुपचाप पायल दबा लेता. इस ने ईमानदारी से मेरे हाथों में सौंप दी. साड़ी आभा तो पहनती नहीं है, इस से दे दी. इसे नौकरानी कह कर अपमानित मत करो. तुम्हारी मम्मी जैसा ही सफाई से सारा काम करती है. थोड़ा उदार मन रखो.’’ ‘‘तो अब आप इसे मम्मी का दर्जा देने लगे,’’ आभा तैश में आ कर बोली.

‘‘आभा, जबान संभाल कर बात करो, क्या अंटशंट बक रही हो. अपने पापा पर शक करती हो? तुम अपने काम और पढ़ाई पर ध्यान दो. मैं क्या करता हूं, क्या नहीं, इस पर फालतू में दिमाग मत खराब करो. परीक्षा में थोड़े दिन बचे हैं, मन लगा कर पढ़ो, समझी,’’ वह क्रोध से बोले तो आभा सहम गई. इस से पहले पापा ने इतनी ऊंची आवाज में उसे कभी नहीं डांटा था. वह रोती हुई अपने कमरे में घुस गई. अमित के समझाने पर भी वह मन का संदेह नहीं दबा पा रही थी. उस का अब पढ़ने में रत्ती भर भी मन नहीं लगता था. उस ने घबरा कर अपनी नानी को खत लिख दिया. नानाजी तो थे नहीं, सोचा, नानी यहां घर पर रह कर सब संभाल लेंगी. तब तक उस की परीक्षा भी निबट जाएगी.

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हफ्ते भर के अंदर नानी आ गईं. महेंद्र अचानक उन्हें देख कर चौंके जरूर परंतु ज्यादा कुछ कहा नहीं, ‘‘अरे अम्मांजी, आप…अचानक कैसे आ गईं?’’ ‘‘भैया महेंद्र, 6 मास से बच्चों को नहीं देखा था. इसलिए नरेंद्र को ले कर चली आई. यह तो कल लौट जाएगा, मैं रहूंगी.’’ ‘‘अच्छा किया आप ने, बच्चों की परीक्षाएं भी पास हैं. आभा को भी कुछ राहत मिलेगी. वैसे मालती बहुत अच्छी औरत हमें मिल गई है. सुबहशाम काम कर के चली जाती है. काम भी सफाई से करती है.’’

‘‘ठीक है भैया, अब तो अमित का एम.ए. फाइनल होने जा रहा है. आभा भी बी.ए. कर लेगी. अमित के लिए लड़की और आभा के लिए अच्छा घरवर देख कर दोनों को निबटा दो. बहू आने से घर-गृहस्थी की समस्याएं सुलझ जाएंगी.’’ ‘‘अम्मांजी, अमित अपने पैरों पर तो खड़ा हो ले, तभी तो कोई अपनी बेटी देगा उसे. आभा के लिए भी अभी देर है. वह एम.ए. करना चाहती है. 2 साल और सही. अभी तो सब काम चल ही रहा है.’’

‘‘ठीक है भैया, जैसा तुम चाहो. पर एक बात पर और ध्यान दो, माया के सब सोनेचांदी के जेवर लाकर में रख दो. घर पर रखना ठीक नहीं है. तुम तीनों घर से बाहर रहते हो, बडे़ नगरों में चोरियां बहुत होती हैं, इसलिए कह रही हूं.’’

‘‘हां, यह ठीक कहा आप ने. अब बैंक में लाकर ले ही लूंगा.’’ बहुत बार कहने पर भी वह लापरवाही बरतते रहे. तब अलमारी के लाकर की चाबी आभा अपने पास रखने लगी थी. जब से उस ने मालती के पैरों में मां की पायल देखी थीं, तभी दोनों भाईबहनों ने बैंक में चुपचाप एक लाकर ले कर सारे जेवर उस में रख दिए थे. पिता से इस की चर्चा नहीं की. सोचा, समय आने पर बता देंगे. बस कुछ नकली जेवर ही उन्होंने घर पर छोड़ रखे थे. नानी एकडेढ़ माह के पश्चात चली गईं. आभा ने कम्प्यूटर क्लास ज्वाइन कर ली थी, इस से वह पापा के नानी के साथ जाने के आग्रह को टाल गई. अमित भी कंप्यूटर कोर्स के साथ ही कोचिंग कर रहा था.

उस दिन आभा जल्दी लौट आई थी, क्योंकि सर के किसी निकट संबंधी की मृत्यु हो गई थी. घर आ कर उसे आश्चर्य हुआ क्योंकि मालती घर पर मौजूद थी, जबकि घर की दूसरी चाबी केवल पापा के पास रहती थी. ‘‘अरे, आज तुम समय से पहले कैसे आ गईं?’’ वह पूछ बैठी. ‘‘साहब आ गए हैं न, उन की तबीयत कुछ ठीक नहीं है,’’ वह कुछ घबराहट में अटकअटक कर बोली. ‘‘तो तुम्हें किस ने बतलाया कि उन की तबीयत ठीक नहीं है. क्या पापा तुम्हें लेने गए थे तुम्हारे घर?’’

‘‘अरे नहीं, वह सुबह कह रहे थे. इस से मैं यों ही चली आई.’’ आभा लपक कर पापा के कमरे में घुस गई, देखा वह अपने बेड पर आंखें बंद किए चुपचाप लेटे हैं. ‘‘पापा, आप ने सुबह हम लोगों को क्यों नहीं बतलाया कि आप की तबीयत ठीक नहीं है. मैं आज नहीं जाती,’’ वह उन के माथे पर हाथ रख कर बोली तो उन्होंने पलकें खोलीं, ‘‘अरे, ऐसी खराब नहीं है. थोड़ा सिरदर्द था सुबह से, सोचा ठीक हो जाएगा, इस से आफिस चला गया, पर दर्द कम नहीं हुआ तो लौट आया. सुबह मालती से यों ही कह दिया था तो वह चली आई.’’

परंतु टेबिल पर जूठी पड़ी प्लेटों में समोसे-रसगुल्लों के टुकड़े कुछ और ही कहानी कह रहे थे. 2 प्लेटें, 2 चाय के मग, क्या यह सब नित्य उन के जाने के बाद होता है? मन के किसी कोने में शंका के अंकुर सबल पौध से सिर उठाने लगे. उस ने देख कर भी अनदेखा कर दिया और कुछ क्षण वहां बैठ कर रसोई की ओर आई तो देखा, मालती गैस के नीचे कोई पालीथीन की थैली छिपा रही है. ‘‘यह गैस के नीचे कचरा क्यों ठूंसा तुम ने?’’ उस ने झपट कर थैली को बाहर घसीटा तो 2 रसगुल्ले, 2 समोसे जमीन पर आ गिरे. मालती का मुंह सफेद पड़ गया. ‘‘अरे, ये कहां से आए?’’

‘‘ये…ये बचे थे, साहब ने कहा कि रख लो, बच्चों को दे देना. इसलिए रख लिए.’’ आभा कुछ भी न बोल पाई. उस का मन किसी भावी आशंका की चेतावनी दे रहा था. शाम को जब अमित घर आया तो आभा ने उसे सब बता दिया. उस के ललाट पर भी चिंता की गहरी रेखाएं खिंच गईं. जब से उन की मां नहीं रहीं पापा खाना प्राय: अपने कमरे में ही मंगा कर खाते थे. मालती 1-1 फुलके के बहाने कई चक्कर उन के कमरे के लगा लेती थी. यह आभा को बहुत अखर रहा था.

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एक दिन वह बोली, ‘‘मालती, तुम जल्दी खाना बना कर घर चली जाया करो.’’ ‘‘साहब को गरम फुलके पसंद हैं और आप लोगों को भी तो. देरसवेर की क्या बात है. बना खिला कर चली जाया करूंगी. आप क्यों परेशान हो, मुझे तो आदत है.’’

‘‘नहीं, तुम कल से हम दोनों का खाना कैसरोल में बना कर रख दिया करो और आटा सान कर रख देना, मैं पापा को खुद सेंक कर खिला दूंगी. जैसा मैं ने कहा है वैसा करो, समझी,’’ उस ने जरा सख्त लहजे में कहा तो वह चुप रह गई. परंतु थोड़ी देर पश्चात ही उस की चुप्पी का कारण सामने आ गया. पापा ने आभा को आवाज दी. ‘‘तुम ने मालती को शाम का खाना बनाने से क्यों मना किया?’’

‘‘मना कहां किया, पापा. यह कहा कि हम दोनों का खाना बना कर कैसरोल में रख दे, अगर आप गरम फुलके चाहेंगे तो मैं सेंक कर आप को खिला दूंगी, तो वह आप से शिकायत कर गई?’’ आभा को गुस्सा आ गया. ‘‘शिकायत क्यों, बस कह रही थी कि कल से बेबी आप की रोटियां सेंकेगी. बेकार में तुम क्यों गरमी में मरो, बनाने दो उसे.’’

आभा किसी भी तरह मालती को काम से हटाना चाहती थी इसीलिए पापा के हर सवाल का जवाब पर जवाब दिए जा रही थी, ‘‘पापा, पसीने से तरबतर पता नहीं रोज नहाती भी है या नहीं, पास से निकलती है तो बदबू मारती है. अब तो मैं ने उसे मना कर ही दिया है. आप उस से कुछ न कहें, बल्कि मैं तो सोचती हूं बेकार में 1 हजार रुपए महीना क्यों जाए, मैं ही खाना बना लिया करूंगी. मुझे खाना बनाने का अभ्यास भी हो जाएगा.’’

‘‘अरे नहीं, लगी रहने दो उसे, वह बहुत अच्छा खाना बनाती है. बिलकुल तुम्हारी मम्मी जैसा.’’

‘‘बिलकुल झूठ पापा, मम्मी जैसा तो नानी भी नहीं बना पातीं. दादीमां भी कहा करती थीं कि माया जैसा खाना बिरली औरतें ही बना पाती हैं.’’

‘‘पर अब वह बनाने वाली हैं कहां?’’

‘‘पापा, अब मैं बनाऊंगी मम्मी जैसा खाना. कोशिश करूंगी तो सीख जाऊंगी, अब शाम का खाना मैं ही बनाऊंगी.’’

‘‘अरे आभा, उसे लगी रहने दे. उस ने हमारे घर के लिए कई घरों का काम छोड़ दिया है. उस के छोटेछोटे बच्चे हैं. उस का आदमी दारूबाज है, उस को मारतापीटता है. इतनी सुघड़ औरत की कदर नहीं करता.’’

‘‘पर पापा, आप ने सब का ठेका तो नहीं लिया. कल से शाम के खाने से उस की छुट्टी,’’ कह कर वह पापा के उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना कमरे से बाहर निकल गई. पास खड़ा अमित भी सिर हिला कर मुसकरा रहा था.

इधर मालती के मुख पर उदासी का आवरण चढ़ गया. सुबह का खाना निबटा कर वह बोली, ‘‘बेबी, तो मैं जाऊं? पर साहब जाते समय कह गए थे कि शाम को नहा कर आया करूं . सुबह के कपड़ों से पसीने की बदबू आती है, इसलिए वह आप की मम्मी की ये 4 साडि़यां, ब्लाउज दे गए हैं. ये देखिए…’’

उस ने अपने झोले से कपड़े निकाल कर दिखाए तो आभा चकित रह गई. अमित भी पास खड़ा देख रहा था. गुस्से से बोला, ‘‘जब आभा ने कह दिया कि वह अब खाना बनाएगी तब तू पीछे क्योें पड़ी है. हम एक सा खातेखाते ऊब गए हैं. जब से मम्मी गई हैं तेरे हाथ का ही तो खा रहे हैं. अब शाम को नहीं आएगी तू, समझी.’’

‘‘भैयाजी, क्यों एक गरीब के पेट पर लात मार रहे हो. पगार कम मिलेगी तो 4 बच्चों का पेट मैं कैसे भरूंगी?’’

‘‘बस मालती, तेरी गरीबी मिटाने को दुनिया में हम ही तो नहीं बचे हैं, और घर पकड़ ले जा कर,’’ वे दोनों एकसाथ चिल्लाए तो वह आंसू पोंछती बाहर निकल गई. तब दोनों में बहुत देर तक पापा की हरकतों पर चर्चा होती रही.

धीरेधीरे शाम को मालती को न देख कर पापा उदास रहने लगे. आभा शाम को उन की पसंद का ही खाना बनाती. 1-1 चपाती सेंक कर कमरे में दौड़दौड़ कर पहुंचाती परंतु वह चुपचाप ही रहते, कुछ न बोलते. मालती सुबह सब को बना कर खिलाती फिर स्वयं खा कर चुपचाप चली जाती. नित्य के इस नियम से दोनों खुश थे कि इस औरत के चंगुल से उन्होंने पापा को बचा लिया.

जब से मालती का शाम का आना बंद हुआ था पापा 7-8 बजे तक आफिस से घर लौटते. जब वे दोनों पूछते तो कह देते कि आफिस में काम बहुत था या किसी दोस्त का नाम लेते कि वहां चला गया था.

परंतु उस दिन जब अमित ने वह दृश्य देखा तो घबरा कर दौड़ा आया, ‘‘आभा, आज जो देखा उसे सुनोगी तो सिर थाम लोगी. आज पापा के साथ मालती कार में उन की बगल में बैठी थी. मम्मी के जेवर, कपड़े पहने हुए थी. पापा उसे होटल ले गए. वहां उन्होंने कमरा बुक करवाया.’’

‘‘अरे, यह क्या हो रहा है. पापा इतने गिर जाएंगे, कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा था, अब हम क्या करें?’’ वह सिर पकड़ कर कुर्सी पर बैठ गई और फूटफूट कर रोने लगी.

‘‘घबरा मत, आभा, रोने से क्या होगा? कोई उपाय सोचो जिस से इस औरत से पापा को बचा सकें.’’

‘‘भैया, असली जेवर तो सब बैंक में हैं, यहां तो आर्टीफिशयल ही हैं. क्या वही दे दिए पापा ने. मैं अलमारी का लाकर देखती हूं,’’ वह आंसू पोंछती हुई दौड़ी, लाकर खोल कर देखा तो स्तब्ध रह गई. डब्बे खाली पडे़ थे, जेवर गायब थे.

‘‘अच्छा किया, जो जेवर बैंक में रख आए, वरना सब चले जाते,’’ दोनों ने चैन की सांस ली.

‘‘भैया, पापा के दोनों खास दोस्तों से बात करें. संभव है, पापा उन की बात मान लें? नहीं तो मामामामी, नानी, बूआफूफाजी को फोन कर के सब हाल बता दें. बूआजी पापा से बड़ी हैं. पापा उन का लिहाज भी बहुत करते हैं.’’

‘‘नहीं, आभा, अभी हम किसी से कुछ नहीं कहेंगे. पहले मालती का पीछा कर उस के घर व घरवाले का पता लगाऊंगा, तब तुम मेरा खेल देखना. पापा अपने को बहुत होशियार समझते हैं.’’

‘‘मुझ को डर लग रहा है कि कहीं वह कमबख्त इस घर में धरना ही न दे दे.’’

‘‘अपना उतना बड़ा परिवार छोड़ कर क्या वह यहां पापा के साथ आ सकेगी?’’

‘‘ऐसी औरतें सब कर सकती हैं. अखबार में जबतब पढ़ते नहीं कि अपने 6 बच्चों को छोड़ कर फलां औरत अपने प्रेमी के साथ भाग गई, पति बेचारा ढूंढ़ता फिर रहा है.’’

‘‘उस औरत को भी क्या कहें? अभी मां को गए एक साल भी पूरा नहीं हुआ और पापा को औरत की जरूरत पड़ गई, धिक्कार है.’’

‘‘भैया, अगर ऐसी नौबत आई तो मैं मामा के पास चली जाऊंगी,’’ वह आंसू पोंछ कर बोली.

‘‘अपने भैया को बेसहारा छोड़ कर? तब मैं कहां जाऊंगा?’’

‘‘तब तो हम दोनों को नौकरी की तलाश करनी चाहिए. हम किराए का मकान ले कर रह लेंगे. सौतेली मां की छांह से भी दूर. तब मामा आदि के पास क्यों जाएंगे भला, इसी शहर में रहेंगे.’’

‘‘मां, तुम हम दोनों को बेसहारा छोड़ कर क्यों चली गईं. राह दिखाओ मम्मी, हम दोनों कहां जाएं, क्या करें?’’ अमित का धैर्य भी आंसू बन कर फूट पड़ा, आभा भी रो पड़ी.

दूसरे दिन अमित जल्दी घर से निकल कर मालती के इंतजार में स्कूटर लिए छिपा खड़ा था. जैसे ही वह घर से निकली वह छिपताछिपाता पीछे लग गया. उस का घर लगभग 2 किलोमीटर दूर था. अमित ने देखा उस के घर से छिपा कर लाई रोटीसब्जी मालती ने अपने बच्चों और पति में बांट दी. बच्चे खा कर यहांवहां खेलने निकल गए और जल्दी से अपने घर का काम निबटा कर मालती अपने घरवाले के जाते ही सजधज कर निकली. अमित उस के पीछेपीछे चलता रहा. वह मेन बाजार में जा कर खड़ी हो गई. थोड़ी देर बाद पापा गाड़ी ले कर आए. मालती लपक कर कार में बैठ गई. कार फिर उसी होटल की ओर बढ़ी. वे दोनों फिर उसी होटल में जा पहुंचे. अमित लौट आया.

दूसरे दिन मालती के घर से निकलते ही वह उस के पति हरिया के पीछे लग गया. घर से जब वह दूर आ गया तब स्कूटर उस के सामने कर के खड़ा हो गया, ‘‘सुनो भैया, हमारे यहां ढेरों सामान इकट्ठा है. वह हमें बेचना है.’’

‘‘कहां है, आप का घर?’’ वह खुश हो कर बोला.

‘‘वह है दूर. अब आज नहीं कल ले चलूंगा. वह मालती तुम्हारी घरवाली है?’’

‘‘हां, तुम कैसे जानते हो?’’ वह बोला.

‘‘वह हमारे घर के पास ही काम करती है इसलिए जानता हूं. इस टाइम वह कहां जाती है?’’

‘‘वह किसी साहब के यहां जाती है, नौकर है वहां?’’

‘‘परंतु मैं ने तो उसे एक साहब के साथ बड़े होटल में जाते देखा है.’’

‘‘कब? कहां?’’ वह आंखें फाड़ कर बोला.

‘‘वह तो सजधज कर रोज जाती है. चलो, तुम्हें दिखाऊं,’’ बिना कुछ सोचे- समझे वह ठेला एक तरफ फेंक कर  उस के साथ हो लिया. रास्ते भर अमित नमकमिर्च लगा कर ढेरों बातें बताता चला गया. सुन कर वह क्रोध से पागल हो उठा.

‘‘उधर…ऊपर 22 नंबर कमरा खटखटाओ, साहब के साथ मालती जरूर मिलेगी. एक बात और, मेरा जिक्र किसी से मत करना, यही कहना कि मैं ने तुम्हें कार में बैठे देखा था, तभी से पीछा करते यहां आया हूं.’’

‘‘हां, भैया, यही कहूंगा. आज मैं उस की गति बना कर रहूंगा. कहती थी खाना बनाने जाती हूं,’’ इतना ही नहीं ढेर सारी भद्दी गालियां बकता हुआ वह कमरे की ओर बढ़ रहा था.

अमित एक कुरसी पर बैठ कर आने वाले तूफान का इंतजार करने लगा. उसे अधिक इंतजार नहीं करना पड़ा. ऊपर से घसीटते, मारते, गालियों की बौछार करते वह मालती को नीचे ले आया. चारों ओर भीड़ जुटने लगी. तभी पुलिस भी आ पहुंची. पीछेपीछे भीड़ थी. थोड़ी देर की हुज्जत के बाद अमित ने देखा कि पुलिस वाले पापा का कालर पकड़े उन्हें धकियाते नीचे घसीटते ला रहे हैं. पापा का मुंह लज्जा से लाल पड़ गया था पर उसे दया नहीं आई. पुलिस वाले गालियों की असभ्य भाषा में उन्हें झिंझोड़ रहे थे. शायद वह ऊपर से खासी मरम्मत कर के लाए थे.

पुलिस वाले ने एक झन्नाटेदार थप्पड़ मालती के मुंह पर भी दे मारा, उस के मुंह से चीख निकल गई. मुंह से खून बह आया, उसे देख कर पापा पर घड़ों पानी पड़ गया, शर्म से सिर झुकाए वह पुलिस का हाथ झटक कर कार की ओर बढे़, तभी हरिया ने पीछे से उन का कालर पकड़ा, ‘‘ऐ साहब, मैं ऐसे ही नहीं छोड़ूंगा तुम्हें, मेरी औरत की इज्जत लूटी है तुम ने, मैं इस की डाक्टरी जांच कराऊंगा, समझा क्या है तुम ने?’’

‘‘छोड़ कालर, पहले तू अपनी औरत को संभाल फिर बात कर. जब वह राजी है तो दूसरों को दोष क्यों देता है?’’

‘‘तुम ने क्यों बहकाया मेरी घरवाली को?’’

‘‘पहले उस से पूछ, वह क्यों बहकी?’’

‘‘साहब, आप को थाने चलना पडे़गा,’’ पुलिस वाले ने बांह पकड़ कर खींचा.

भीड़ बढ़ती जा रही थी. वह किसी तरह फंदे से निकल कर कार स्टार्ट कर भाग छूटे, लोग चिल्लाते ही रह गए, इधर अमित भी स्कूटर स्टार्ट कर के घर की ओर रवाना हो गया. आते ही उस ने आभा को पूरी घटना बयान कर डाली. सुन कर आभा का मन जहां खुश था वहीं पिता के न आने से दोनों ने रात आंखों ही में काटी. वे दोनों उन के मोबाइल पर भी बात नहीं कर पाए.

दूसरे दिन न मालती आई न पापा. अमित छिप कर मालती के घर के चक्कर लगा आया. वह घर पर जैसे कैद थी. हरिया दरवाजे पर पहरा लगाए बैठा था. जब 3 दिन तक पापा का कुछ पता न लगा तो दोनों ने घबरा कर सब रिश्तेदारों को फोन कर दिए. तुरंत ही सब घबरा कर दौड़े आए. घर आ कर सब चिंता में पड़ गए. अमित ने अपनी चतुराई की रत्ती भर चर्चा नहीं की. वह पिता की व परिवार की नजरों में पाकसाफ रहना चाहता था. आभा ने भी होंठ नहीं खोले.

वे लोग अखबारों में विज्ञापन देने की सोच रहे थे कि दिल्ली से फोन आया कि वह आगरा आदि घूम कर घर लौट रहे हैं. सुन कर सब का चेहरा प्रसन्नता से खिल उठा. जब  वह वापस आए, किसी ने कुछ नहीं पूछा. अमित भी ऐसा बना रहा जैसे उसे कुछ मालूम ही नहीं है. वे दोनों अपने पापा को वापस अपने बीच पाना चाहते थे, शर्मिंदा करना नहीं चाहते थे. पापा के चेहरे पर भी पश्चात्ताप साफ नजर आ रहा था. सब को देख कर वह न हैरान हुए न परेशान, यह जरूर बतलाया कि उन्होंने अपना ट्रांसफर दूसरे शहर में करा लिया है. वह शीघ्र ही यहां से रिलीव हो कर चले जाएंगे.

तभी एक दिन बूआ ने पास बैठ कर गंभीर स्वर में कहा, ‘‘महेंद्र, अगर तू चाहे तो कहीं किसी विधवा से या तलाकशुदा किसी लड़की से बात चलाएं. पेपर में विज्ञापन देने से ढेरों आफर आ सकते हैं.’’

‘‘अरे  नहीं, दीदी, अब इस की जरूरत नहीं है. माया की याद क्या कभी दिल से निकल सकेगी? अब तो अमित और आभा के लिए सोच रहा हूं. दोनों को अच्छे मैच मिल जाएं तो घर आबाद हो जाएगा. मैं अमित को बिजनेस में डालने की सोच रहा हूं. जब तक इस का कारोबार जमेगा आभा भी एम.ए. कर लेगी. अब यहां मेरा मन नहीं लगता, न इन बच्चों का लगता है, क्यों अमित?’’

‘‘हां, पापा, अब यहां नहीं रहेंगे,’’ दोनों चहक उठे. तभी उन्होंने अकेले में अमित से पूछा, ‘‘अमित, तुम ने उस दिन की घटना किसी से बताई तो नहीं?’’ अमित को समझते देर न लगी कि पापा ने उस दिन उसे घटना वाली जगह पर देख लिया था.

बिना घबराए वह बोला, ‘‘नहीं, पापा, मेरी तो समझ में नहीं आया था कि यह क्या हो रहा है. मैं तो रोज की तरह उधर से गुजर रहा था कि झगड़ा और शोर सुन कर उधर आ गया, पता नहीं मालती किस के साथ थी, नाम आप का लग गया. जो हो गया उसे भूल जाइए, पापा. नए शहर में नया माहौल और नए लोग होंगे. आप यहां का सब भूल जाएं तो अच्छा है. इज्जतआबरू बची रहे यही सब से बड़ी बात है,’’ उसे विश्वास हो गया था कि पापा को जो ठोकर लगी है वह जिंदगी भर के लिए एक सबक है. सुबह का भूला घर आ गया था.

उद्यापन: पाखंड नहीं तो और क्या

धर्मगुरू अपनी पैनी नजर महिलाओं पर रख धर्म के पालन की जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर रखते रहे हैं. वे जानते थे और जानते हैं कि धर्मभीरु महिलाएं जल्द उन के प्रवचनों को आत्मसात कर उन के दिखाए मार्ग पर चल पड़ती हैं. तभी तो धर्म के ठेकेदार महिलाओं को पतिपुत्र, पिताभाई की उम्र, स्वास्थ्य व उन के कुशलमंगल के पूजापाठ में उलझाने में पूरी तरह सफल रहे हैं.

अभी तक पूजापाठ, व्रतउपवास का ही मकड़जाल था पर अब ‘उद्यापन’ भी इन में जुड़ गया है, जो अंधविश्वास के धरातल को और मजबूत कर रहा है. उद्यापनपूर्ति में धन और समय के अपव्यय के साथसाथ महिलाएं कूपमंडूक बन अपनी सोचनेसमझने की शक्ति को शून्य बना अपने आसपास व रिश्तेदारी में स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करती हैं. इस दौड़ में शिक्षित वर्ग भी बढ़चढ़ कर भाग लेता है, क्योंकि हर व्रत की कथा का सार कहता है कि जब तक उद्यापन नहीं होगा व्रत सफल नहीं होगा.

नंदीपुराण और निर्णय सिंधु में वर्णन है कि ‘‘उद्यापनं बिना यत्रुतद् व्रत निष्फलं भवेत.’’

उद्यापनों की लंबी फिहरिस्त

‘दशा डोरा’ का उद्यापन, ‘करवाचौथ’ का उद्यापन, ‘सोलहसोमवार’ का उद्यापन, ‘मंगला गौरी’ का उद्यापन, ‘प्रदोष व्रत’ का उद्यापन, ‘पूर्णमासी व्रत’ का उद्यापन, ‘संकष्ट चतुर्थीव्रत’ का उद्यापन, ‘संतोषी माता व्रत’ का उद्यापन, ‘गनगौर व्रत’ का उद्यापन, ‘सूरज’ का उद्यापन आदि. यानी जो भी व्रत रखा जाए उस का उद्यापन तो करना ही है तभी मन्नत पूर्ण होगी.

हर उद्यापन के पहले संबंधित व्रत की कथा पढ़ी व सुनी जाती है. इन कथाओं को पूर्ण निष्ठा व विश्वास के साथ बिना कोई तर्कवितर्क किए सुना जाता है. तर्क करने पर ‘पाप’ लगेगा तथा ईश्वर के दंड के भागी न बन जाएं, इस भय से कोई भी जातक तर्ककरने की सोचता भी नहीं.

सोशल मीडिया में ऐसे उद्यापनों की भरमार है. वैबसाइटों पर उद्यापनों के प्रचार सहित उन पर आए खर्च सहित उद्यापन पूजा कराने का पूरा विवरण प्रसारित हो रहा है. यू टयूब पर धार्मिक वीडियो, उद्यापन की पूरी विधि सहज उपलब्ध है.

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कुछ उद्यापनों की मायानगरी

करवाचौथ उद्यापन: सुहाग की लंबी आयु के लिए महिलाएं इस व्रत को पूरी श्रद्धा के साथ भूखीप्यासी रह कर रखती हैं. शाम को 4 बजे के लगभग सभी महिलाएं एक जगह इकट्ठी हो कर पंडितजी से बड़ी श्रद्धापूर्वक कथा सुनती हैं. पंडितजी हर साल की तरह अपनी रटीरटाई कथा सुना कर हजारों रुपए और खाद्यसामग्री समेट लेते हैं. यहां तक देखा जाता है कि अनपढ़ पंडितानी भी कथा सुना कर सैकड़ोंहजारों रुपए पा जाती है, साथ ही कथा द्वारा यह संदेश भी दिया जाता है कि यदि भूखे रह कर व्रत नहीं किया तो सुहाग पर आंच आएगी.

अब सुहागिन महिला जब इस व्रत का उद्यापन करती है तो विचार आया कि एक तरफ तो महिला कहती है कि जब तक सांस चले मैं व्रत करती रहूं, फिर उद्यापन क्यों? जबकि उद्यापन का अर्थ है- समाप्त/पूर्ण.

उद्यापन करती एक स्कूल टीचर ने बताया कि उद्यापन के बाद चाय, फल लिया जा सकता है. तबीयत ठीक न होने पर व्रत न रखने से कोई दोष नहीं होगा.

उद्यापन विधि: 13 सुहागिनों को सुपारी दे कर आमंत्रित किया जाता है. उन्हें चंद्रमा दर्शन के बाद भोजन करा कर शृंगार का सामान, वस्त्र और पैसे दे कर विदा किया जाता है. पंडितजी या पंडितानी को संतुष्ट कर के लिए अलग से धन दिया जाता है.

अगर उद्यापन किए बिना चाय, पानी, फल लिया जाए तो क्या पति की आयु पर प्रहार होगा?

इतनी छोटी सी बात पर तर्क नहीं किया जाता. सदियों से चली आ रही लकीर की फकीर बनी उच्चपदासीन व शिक्षित महिलाएं स्वयं को सौभाग्यशाली मान फक्र करती हैं. अगर कोई दुस्साहस करे तो आसपास की महिलाएं हिकारत की नजरों से देखती हैं. बैंक में कार्यरत व्रत न करने वाली निशा गर्ग, व्रत के दिन चपरासी से जब भी पानी मंगाती तो वह अजीब सी नजरों से देखता और पास बैठी महिलाएं भी उसे अजीब नजरों से देखती कि उन के बीच यह पाखंड विरोधी कहां से आ गई.

ऋषिपंचमी उद्यापन: यह व्रत भाद्रपद की शुक्ल पंचमी को किया जाता है. इस में 7 ब्राह्मणों की पूजा महिला अपने दोषों से मुक्त होने के लिए करती है. जो महिलाएं माहवारी के समय नियमपालन से चूक कर दोषी हो जाती हैं वे यह व्रत करती हैं.

कथानुसार, एक ब्राह्मण की बेटी ने माहवारी में घर के बरतन छू लिए, इसलिए उसे पाप लगा. वह विधवा हो गई और उस के शरीर में कीड़े पड़ गए. इस सब से छुटकारा पाने और अगले जन्म में सुखी जीवन पाने के लिए उस ने यह व्रत किया.

इसी व्रत के लिए एक और कथा है कि महाभारत काल में उत्तरा के गर्भ को अश्वत्थामा ने नष्ट कर दिया. तब इसी व्रत को कर के उत्तरा ने परीक्षित को जन्म दिया. मान्यतानुसार इस व्रत को करने से उत्तरा ‘गर्भपात’ के दोष से मुक्त हो गई. सोचने की बात है कि गर्भ नष्ट किया अश्वत्थामा ने तो फिर उत्तरा कैसे और क्यों दोषी? क्या इसलिए कि हर बात के लिए नारी को दोषी ठहराना सहज है कि पुरुष के बलात्कार की दोषी नहीं होती है. मजे की बात यह है कि ऋषि पंचमी का उद्यापन माहवारी बंद होने पर ही किया जाता है. इस के लिए 7 ब्राह्मणों को वस्त्र, भोजन, दान, धन आदि सूर्योदय से पूर्व दे कर हवन किया जाता है.

दशा डोरा उद्यापन: एक पत्रिका में एक खबर छपी थी: ‘‘महिलाओं ने बड़ी मात्रा में शनिवार को दशामाता का व्रत कर पीपल पर सूत लपेटा.’’

इस का उद्यापन करने से होली (लकडि़यों के ढेर) पर कच्चा सूत लपेटने और गले में कच्चे सूत की 16 लडि़यों की माला पहनने का बंधन खत्म हो जाता है. इस पूजा में भी 8 महिलाओं को बरतन, मिठाई, दक्षिणा तथा इच्छानुसार वस्त्र दिए जाते हैं.

एकादशी व्रत उद्यापन: एकादशी व्रत माह में 2 होते हैं. इन में गीता पाठ व निर्जला या फलाहार व्रत का विधान रखा गया है. इस का उद्यापन एक बड़े उत्सव के रूप में किया जाता है. एकादशी के दिन 26 ब्राह्मणों को निमंत्रित कर पूजापाठ किया जाता है. उन्हें फलाहार दिया जाता है. फिर दूसरे दिन उन्हीं 26 ब्राह्मणों को पूरा भोजन आदि कराया जाता है और वस्त्र, फल, दक्षिणा दे कर विदाई दी जाती है. विशेष बात यह है कि परिवार के सभी लोगों को, आसपास के लोगों को भी बुलाया जाता है. बेटी, बहनों को वस्त्र, दक्षिणा आदि दी जाती है. यह फंक्शन एक विवाह समारोह जैसा ही किया जाता है.

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मथुरा शहर की सरलाजी का कहना है, ‘‘एकादशी उद्यापन कर के मेरे दिल पर रखा  बोझ उतर गया. इस के लिए बिना मेरा व्रत व्यर्थ ही रह जाता.’’

एमए, पीएचडी की डिग्रीधारक महिलाएं भी व्रत, उपासना, साधुसंतों, दान, उद्यापन आदि की ओर बिना किसी तर्क के चल देती हैं. ये सब बचपन से दिए गए विचारों और मानसिक कमजोरी का प्रतिफल होता है. तभी तो हर धार्मिक स्थल पर महिलाओं की भारी भीड़ दिखती है.

सोलह सोमवार उद्यापन

नारदपुराण के अनुसार 3 प्रकार के सोमव्रत होते हैं- ‘प्रति सोमवार,’ ‘7 सोमवार’, ‘16 सोमवार’.

हर प्रकार के सोमवार व्रत का उद्यापन किए बिना फल नहीं मिल सकता.

शास्त्रों में हर देवता का दिन निश्चित है. शिवपार्वती का दिन सोमवार है. कथा में डराया जाता है कि अगर व्रत/उद्यापन में कोई गड़बड़ी की गई तो शिवजी के कोपभाजन का शिकार बनना होगा.

उद्यापन प्रथम या महीने के तीसरे सोमवार को करना चाहिए. इस में इतने ब्राह्मणों को भोजन, दानदक्षिणा आदि देनी चाहिए जितने सोमवार व्रत किए गए हो.

इसी तरह ‘सूरज उद्यापन’ रविवार को, ‘शुक्रवार व्रत उद्यापन’ संतोषी माता को प्रसन्न करने के लिए शुक्रवार को किया जाता है. इतना ही नहीं, उद्यापनों की लंबी सूची है- ‘प्रदोष व्रत उद्यापन’, ‘मंगला गौरी उद्यापन’ आदि.

अंधविश्वास को एक कदम और आगे ले जाने वाला रास्ता.

अगर उद्यापन, पूजा आदि के लिए समयाभाव हो, आप का परिवार एकत्र न हो पाए तो आप पंडित/पुरोहित द्वारा यह कार्य करा कर पूर्ण फल प्राप्त कर सकते हैं. बस आप को एक निश्चित धनराशि देनी होगी. इस प्रकार के प्रवचन, आश्वासन जातक को बांधे रहते हैं और पंडितों की जेबें भरते रहते हैं.

एक कथा वाचक के जादुई वाक्य, ‘‘हमारी माताएं, बहनें, बेटियां सदियों से अपने परिवार के लिए उत्सर्ग करती आई हैं. यही नारीशक्ति तो इस धरणी का भार संभाले हुए है…’’

अभी वाक्य पूरा भी नहीं हुआ था कि पूरा पंडाल महिलाओं की तालियों से गूंज उठा. इस समूह में रिटायर्ड उच्चपदासीन व टीचर वर्ग भी था. इस प्रकार के जादुई शब्दों द्वारा नारीमंडल स्वयं को भाग्यशाली व गौरवान्वित महसूस कर कृतार्थ होता है.

दुख की बात है कि टीवी चैनल और सोशल मीडिया भी अंधविश्वास को बढ़ाने में बढ़चढ़ कर भाग लेते हैं. ताबीजगंडा, रत्न, पूजा आदि को हर परेशानी का हल बता कर दुखी व्यक्ति को चंगुल में फंसाने का भरपूर प्रयास होता है.

गूगल पर पैकेज भी मिलते हैं- पूजा पैकेज, पूजा साम्रगी, बुक पंडित औनलाइन, औन साइट पूजा आदि. अब इस धर्म के फंदे से बचना स्वयं स्त्री वर्ग के हाथ में है.

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